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मेरे आने और तुम्हारे जाने के बीच

बस चंद कदमों का फासला रहा

न मै जल्दी आया कभी

न कभी तुमने इंतज़ार किया

ये फासला ही तो था

जिसे हमने

संजीदगी और ईमानदारी के साथ निभाया

फासले को

सिमटने नहीं दिया

और न ही

मिटने दिया

हम जुड़े रहे

फासले के साथ

बावजूद

तमाम मुश्किलों और तकलीफ़ों के

वो जिंदा रहा हमारे बीच

फासला बनकर  

और हम

मरते रहे, मरते रहे, मरते रहे

अपनेअपने अहम के साथ ...

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 2, 2013 at 7:14pm

बेहतरीन भाव क्या बात है ............फासलो को ही अहमियत दे रहे हैं या मन के अहम् को बेहतरीन बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by ram shiromani pathak on February 2, 2013 at 6:54pm
सुन्दर भाव रचना बधाई नादिर खान जी 
दो के बीच अहम् का यह टकराव
फांसले के कारण ही यह अलगाव 
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 2, 2013 at 3:21pm
सुन्दर भाव रचना बधाई नादिर खान जी 
दो के बीच अहम् का यह टकराव
फांसले के कारण ही यह अलगाव 
Comment by vijay nikore on February 2, 2013 at 3:02pm

नादिर खान जी,

यह अहम ही तो मानव का पतन है। कितना ही प्रयास करें इसे छंट नहीं पाते। हां, कोशिश करें तो इसे कम कर सकते हैं।

बधाई।

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 2, 2013 at 10:05am

अहम् की दीवारों का फासला दीखता तो नहीं, पर जिनके बीच होता है वो सच में मरते मरते ही जीते हैं,

काश अहम् को छोड़ सर्व-स्वीकार्यता के साथ ही इंसान बढ़ें, रिश्ते बढ़ें बिना फासलों के.

इस सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकारें आ. नादिर खान जी.

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