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फांसले दिल के अब मिटते नहीं हैं हमसे

प्यार ने तेरे बीमार बना रखा है
जा चुके कल का अख़बार बना रखा है

फांसले दिल के अब मिटते नहीं हैं हमसे
चीन की खुद को दीवार बना रखा है

बेचकर गैरत अपनी सो चुके हैं कब के 
हमने उनको ही सरदार* बना रखा है

शोर सा मेरे इस दिल में ऐसा मचा है
जैसे गठबंधन सरकार बना रखा है

चापलूसों का दरबार लगा है नादिर
झूठ को ही कारोबार बना रखा है

*सरदार = मुखिया

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Comment by नादिर ख़ान on February 3, 2013 at 7:24pm

अदरणीय गणेश जी थोड़ा विस्तार से समझायें ताकि आसानी हो.

शुक्रिया.

Comment by नादिर ख़ान on January 26, 2013 at 7:06pm

अदरणीय गणेश जी शुक्रिया कोमेंट्स के लिए। 

आपका सुझाओ सर आँखों पर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 26, 2013 at 3:12pm

नादिर भाई , ख्याल अच्छा है, ग़ज़ल और मसक्कत की मांग करती है , वजन दुरुस्त करने के लिए अदायगी को अस्पष्ट करना ठीक नहीं ।

Comment by नादिर ख़ान on January 25, 2013 at 10:38am
शुक्रिया शलिनी जी.
Comment by shalini kaushik on January 25, 2013 at 1:05am

सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति

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