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भर रही हुंकार सरहद लहू का टीका सजा के

ले गए मुंड काट कायर धुंध में सूरत छुपा के 

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के 

नर पिशाचो के कुकृत्य अब सहे ना  जायेंगे 

दो के बदले दस कटेंगे अब रहम ना  पायेंगे

बे ज़मीर हो तुम दुश्मनी  के भी लायक नहीं

कहें जानवर तो होता उनका भी अपमान कहीं

होते जो इंसा ना जाते अंधकार में दुम दबा के 

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के 

बारूद  के ज्वाला मुखी  को दे गए चिंगारी तुम

अब बचाओ अपना दामन मौत के संचारी तुम 

भाई कहकर  छल से पीठ पर करते वार हो

तुम कायर तुम नपुंसक   बुद्धि से लाचार हो

मृत हो संवेदना जिसकी वो खुदा का बंदा नहीं 

माँ का दूध पिया जिसने वो भाव से अंधा नहीं 

मूषक स्वयं शिकारी समझे सिंघों के शीर्ष चुराके  

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के 

 देश के बच्चे बच्चे को तुमने अब उकसाया है 

राम अर्जुन भगत सिंह ने अब गांडीव उठाया है 

मत लो परीक्षा बार बार तुम देश के रखवालो की 

बांच लो किताब फिर से आजादी के मतवालों की 

वही  लहू है वही  युवा हैं वही वतन की है  माटी 

वही जिगर है वही हवा है वही जंग  की परिपाटी

 ले रहे सौगंध सिपाही छाया में अपनी ध्वजा के 

भर रही हुंकार सरहद लहू  का टीका सजा के ।

**********************************************

 

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Comment by upasna siag on January 17, 2013 at 4:46pm

बहुत सही लिखा आपने राजेश कुमारी जी .......ऐसे नृशंश लोगो को जानवर कहना भी जानवर का अपमान है ....सीमा पर जोश भरती आपकी रचना बहुत अच्छी लगी ....

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 17, 2013 at 3:56pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी सादर प्रणाम
बहुत सुन्दर समसामयिक अभिव्यक्ति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 17, 2013 at 3:03pm

राजेश कुमार झा जी बहुत पसंद आई आपकी पंक्तियाँ सराहना पाकर मन प्रसन्न हुआ हार्दिक रूप से आभारी हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 17, 2013 at 2:48pm

 आदरणीय प्रदीप  कुशवाह जी आपने मेरे उद्द्गारों में अपने शब्द मिलाये हार्दिक रूप से आभारी हूँ 

Comment by राजेश 'मृदु' on January 17, 2013 at 2:29pm

बिल्‍कुल सामयिक प्रस्‍तुति है । मुझे अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियां याद हो आई

'वीर भाल पर तिलक शोभता, गलियों का गर्द गुबार नहीं

हो जाता वह प्रेम तिरष्‍कृत जिसका पौरूष आधार नहीं

शक्तिपुत्र हे अब निर्भय हो शस्‍त्रों का संधान करो

एक प्रहार से कोटि दनुज का आज अभी अवसान करो'

बहुत सही लिखा है आपने , सादर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 17, 2013 at 2:01pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी 

सादर 

मृत हो संवेदना जिसकी वो खुदा का बंदा नहीं 

माँ का दूध पिया जिसने वो भाव से अंधा नहीं 

जवानों ने भारी हुंकार 

सारा भारत है तैयार 

बधाई 

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