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उड़ेल दिए क्या नमक के बोरे ,या चाँदी  की किरचें  बिछाई 

लटके यहाँ- वहां  रुई के गोले  क्या  बादलों   की फटी रजाई 

मति मेरी  देख- देख चकराई |

डाल- डाल पर  जड़े कुदरत ने जैसे धवल नगीने चुन- चुन कर  

लगता कभी- कभी  जैसे धुन रहे  रूई  को अम्बर में धुनकर  

 नग्न खड़े दरख्तों को किसने श्वेत- श्वेत पौशाकें  पहनाई 

 मति मेरी  देख देख चकराई |

सुन्न कम्पित  नीर दूधिया संग लेकर बहती  झेलम की धारा 

तटों पर श्वेत आइस क्रीम सी बिखरी शून्य हुआ तल का पारा   

 जाने किसने झीलों को पारदर्शी  कांच की चुनरी   उढाई   

मति  मेरी  देख- देख चकराई 

सड़कें धुली- धुली  क्षीर से  हिम रजत से पर्वतों  के ढके  बदन  

उज्जवल ,धवल चांदी उबटन  से लिपटे हों  जैसे  उनके   वदन  

किरणों   ने मस्तक जो चूमा उनका   रवि की आँखें चौंधियाई 

मति मेरी देख देख चकराई 

****************************************************************

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 15, 2013 at 6:23pm

हार्दिक आभार प्रिय संदीप आपको रचना पसंद आई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 15, 2013 at 4:10pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी सादर प्रणाम 
बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने बर्फीली बादियों को बधाई हो आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 15, 2013 at 12:03pm

आदरणीय लक्ष्मण जी हार्दिक आभार आपका आपने मेरी कल्पना और यात्रा के फलस्वरूप उपजे भावों को सराहा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 15, 2013 at 12:01pm

आदरणीय सौरभ जी हर्षित हूँ की आपने मेरी कश्मीर यात्रा के दौरान उभरे हृदय के उद्द्गारों को सराहा ,जैसा देखा महसूस किया जो कल्पना की थी उससे भी अधिक निकला हार्दिक रूप से आभारी हूँ आपकी प्रतिक्रिया पाकर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 15, 2013 at 11:40am

श्वेत बर्फीला कश्मीर पढ़ कर ऐसा लगा जैसे मै ही कश्मीर की वादियों में भ्रमण कर रहा हूँ । अब आपकी रचना और चित्र से यह फिर सुखद अहसास हुआ है । 

सुन्न कम्पित  नीर दूधिया संग लेकर बहती  झेलम की धारा 

तटों पर श्वेत आइस क्रीम सी बिखरी शून्य हुआ तल का पारा   

सड़कें धुली- धुली  क्षीर से  हिम रजत से पर्वतों  के ढके  बदन  

उज्जवल ,धवल चांदी उबटन  से लिपटे हों  जैसे  उनके  वदन 

मति मेरी देख देख चकराई --------------सुन्दर भावाभिव्यक्ति, और सुन्दर चित्र के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया राजेश कुमारी जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 15, 2013 at 11:00am

आदरणीय राजेश कुमारीजी, कश्मीर के इस सुन्दर शब्द-चित्र के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. दृश्य के अनुरूप मनोभावों को शब्द देते जाना उतना सहज नहीं होता जितना प्रतीत होता है. हिम-बगूलों को देख जहाँ नमक के बोरों के खुल जाने या रजाई के फट जाने या फिर धुनकी (धुनकर) द्वारा रुई धुनने आदि की कल्पना करना आपके अंतर में अबतक रमें चिर-शिशु का उत्फुल्ल व आह्लादित होना जताता है, वहीं उज्जवल ,धवल चांदी उबटन से लिपटे हों जैसे उनके वदन // किरणों ने मस्तक जो चूमा उनका रवि की आँखें चौंधियाई.. जैसी पंक्तियाँ अभिभूत करती प्रकृति-सुषमा को निरखती अनुभवी आँखों की संवेदनाएँ साझा करती हैं. 

आप द्वारा हुई कश्मीर यात्रा को हमसब भी जी पाये, इस हेतु आपका धन्यवाद तथा रचना हेतु बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 15, 2013 at 8:33am

अशोक कुमार रक्तेला जी हार्दिक आभार आपका इन वादियों पर लिखे शब्द आपको पसंद आये 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 14, 2013 at 11:22pm

आदरेया राजेश कुमारी जी सादर, काश्मीर कि बर्फीली वादियों को आप किस तरह मन में बसा लायी हैं आपके गीत में दिख पड़ रहा है. बहुत सुन्दर गीत. सादर बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 14, 2013 at 7:14pm

प्रिय प्राची सच कहा वहां की ख़ूबसूरती मन में गहराई  तक समा  गई है मैंने हर मौसम में कश्मीर को देखा किन्तु जितना सुन्दर सम्मोहक इस वक़्त लगा पहले से कही ज्यादा अद्दभुत ,उसको आज कल अपने ब्लॉग पर सचित्र साझा कर रही हूँ वक़्त मिले तो जरूर पढियेगा दो पोस्ट हो चुकी हैंhttp://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in/ हार्दिक आभार आपका 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 14, 2013 at 7:04pm

बर्फ की चादर ओढ़ी कश्मीर की वादियां और झेलम का सुन्दर शब्द चित्र, 

मन में बसी प्रकृति की इस ख़ूबसूरती को शब्दबद्ध करने के लिए बधाई आदरणीय राजेश जी 

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