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बदन पे आज कपडा तंग होता जा रहा है क्यूँ

यहाँ आजाद है हर सख्स थोपा जा रहा है क्यूँ
लडूं अधिकार की गर जंग रोका जा रहा है क्यूँ

हुआ है आज का हर आदमी अब तो सलामत-रौ
बदन पे आज कपडा तंग होता जा रहा है क्यूँ

नहीं बेफिक्र है लोगो जिसे हालात है मालुम
जवाँ फिर आज मूंदे आँख सोता जा रहा है क्यूँ

सलीका इश्क करने का कभी आया नहीं लेकिन
जिसे देखो दिलों में आग बोता जा रहा है क्यूँ

खुदी मसरूफ है फिर भी शिकायत वक़्त से करता
न जाने फूल नफ़रत के पिरोता जा रहा हैं क्यूँ

ग़मों में मुस्कुराने की अदा में जो हुआ माहिर
ख़ुशी के फिर बहाने ढूंढ रोता जा रहा है क्यूँ

यकीं करता नहीं है यार पर वादे हजारों ले 
वजूदे इश्क खो पहचान खोता जा रहा है क्यूँ

खराबी से नहीं तौबा किया जब "दीप" उसने तो
बहा के चश्म-गंगा पाप धोता जा रहा है क्यूँ 


संदीप पटेल "दीप"

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Comment by rajesh kumari on August 8, 2012 at 8:35pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल बहुत बहुत बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 8, 2012 at 12:15pm

वाह संदीप भाई मज़ा आ गया बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल क्या बात है

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:15am

आदरणीया रेखा जी सादर प्रणाम
आपकी प्रातक्रिया से एक उत्साह सा जगा है
कुछ और बेहतर करने का
ये स्नेह यूँ ही बनाये रखिये आपका बहुत बहुत आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:14am

आदरणीय योगी जी सादर नमन
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार
अपना ये स्नेह बनाये रखिये यूँ ही

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:13am

आदरणीया सीमा जी सादर प्रणाम
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार
अपना ये स्नेह अनुज पर यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:11am

आदरणीय अशोक जी सादर नमन
आपका बहुत बहुत शुक्रिया और सादर आभार
आपको लेखन पसंद आया लिखना सफल हुआ
स्नेह बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:10am

आदरणीय उमाशंकर सर जी सादर प्रणाम
ये सब आप मित्रों के असीम स्नेह की ही परिपाटी है जो मैं थोडा बहुत लिख पाता हूँ
आपका बहुत बहुत शुक्रिया और आभार
स्नेह बनाये रखिये ...

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 8, 2012 at 11:09am

आदरणीय भ्रमर सर जी सादर नमन
आपका बहुत बहुत शुक्रिया और सादर आभार
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by Rekha Joshi on August 8, 2012 at 10:44am

ग़मों में मुस्कुराने की अदा में जो हुआ माहिर 
ख़ुशी के फिर बहाने ढूंढ रोता जा रहा है क्यूँ ,अति सुंदर भाव ,बहुत बहुत बधाई संदीप जी 

Comment by Yogi Saraswat on August 8, 2012 at 9:52am

यकीं करता नहीं है यार पर वादे हजारों ले 
वजूदे इश्क खो पहचान खोता जा रहा है क्यूँ

सुन्दर अल्फाजों से सजी हुई ग़ज़ल !

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