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सबके होते हुए वीरान मेरा घर क्यूं है,
इक ख़मोशी भरी गुफ़्तार यहां पर क्यूं है !

एक से एक है बढ़कर यहां फ़ातेह मौजूद,
तू समझता भला ख़ुद ही को सिकन्दर क्यूं है !

वो तेरे दिल में भी रहता है मेरे दिल में भी,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मन्दर क्यूं है !

सब के होटों पे मुहब्बत के तराने हैं रवाँ,
पर नज़र आ रहा हर हाथ में ख़न्जर क्यूं है !

क्यूं हर इक चेहरे पे है कर्ब की ख़ामोश लकीर,
आंसुओं का यहां आंखों में समन्दर क्यूं है !

तू तो हिन्दू है मैं मुस्लिम हूं ज़रा ये तो बता,
रहता अक्सर तेरे कांधे पे मेरा सर क्यूं है !

काम इसका है अंधेरे में दिया दिखलाना,
राह भटका रहा ’शम्सी’ को ये रहबर क्यों है !

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Comment by DEEP ZIRVI on October 9, 2010 at 11:34pm
तू तो रहमत के साइवा कुच्छ भी नही ;क्यों उठे अक्सर है फिर तेग-ओ-तमर तेरे लिए
Comment by आशीष यादव on October 6, 2010 at 10:48pm
Waah waah, sach bahut khubsurat.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2010 at 10:03pm
वाह वाह मोईन शमशी साहिब कमाल है , बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल,आज की मतलबी दुनिया की पहचान कराता यह शे'र ............
सब के होटों पे मुहब्बत के तराने हैं रवाँ,
पर नज़र आ रहा हर हाथ में ख़न्जर क्यूं है !
वाकई जबरदस्त कही है आपने , दाद कुबूल करे ,

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