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जब जब बेटी के ससुराल से फोन आता तो भार्गव जी अन्दर तक काँप उठते. दरअसल शादी के एकदम बाद दामाद ने नई कार देने की मांग रख दी थी. उसी वजह से कई बार बिटिया मायके आ भी चुकी थी. मामूली सी पेंशन पाने वाले भार्गव जी हर बार बिटिया को समझा बुझा कर वापिस भेज देते. लेकिन इस बार ससुराल का इतना दबाव था कि बिटिया समझाने पर भी नहीं मान रही थी और ज़िद पकड़ कर बैठ गई थी. भार्गव जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें.

आखिर एक दिन
अचानक दामाद के लिए नई कार आ ही गई, और बेटी अगले रोज़ अपने पति के साथ नई गाड़ी में ख़ुशी ख़ुशी विदा हो गई. भार्गव जी के मन से एक भारी बोझ उतरा, लेकिन उनकी पत्नी ऐसी अनुचित मांग को पूरा करने पर बेहद नाराज़ थी.

"आज तो आपने इनकी मांग पूरी कर दी, लेकिन कल इन्होने कोई और महंगी चीज़ मांग ली तब आप क्या करोगे ?"
"चिंता काहे करती हो भगवान्, अभी तो एक और किडनी मौजूद है मेरे शरीर में."

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Comment by शरद कुमार on September 29, 2012 at 6:21pm

 बहुत ही मर्मस्पर्शी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 2, 2012 at 11:42am

शुक्रिया राज़ साहिब.

Comment by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 7:19pm

मर्मस्पर्शी!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 28, 2012 at 8:28pm
आपने लघुकथा के मर्म को पहचाना और पसंद किया, हार्दिक आभार सावी जी.
Comment by savi on June 28, 2012 at 6:32pm

prbhakar ji, kidni to shrir me do hi hai par dahej ke rakhsh ke sir anek, aakhir majbur pita beti ke sukh ke liye kya kya bachega | sach me bete aur beti ke bich fark krane ke liye ye dahej namk asur hi to hai | dil ko chu lene vali kahani ke liye aapko badhai |


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 26, 2012 at 9:57am

भाई उमाशंकर मिश्र जी, लघुकथा पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.  


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 26, 2012 at 9:57am

भाई राज तोमर जी, उत्साहवर्धन हेतु ह्रदय से आभार.

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 26, 2012 at 9:12am

अत्यंत मर्मस्पर्शी लघु कथा है भाई संजय मिश्र हबीब के कथन से सहमत हूँ पर इश्वर से प्रार्थना है की ऐसा घटित ना हो

Comment by Raj Tomar on June 25, 2012 at 10:38pm

सर जी , यह कथा बहुत ही मर्मस्पर्शी है.किस पहलू को देखा जाये समझ नहीं आता. एक बाप अपनी बिटिया की खुशी के लिए किडनी बेंच दिया...जिंदगी अपनी दाव पर लगा दिया..घर की हालत देखते हुए भी बिटिया कार ले ली..:(
अजीब बात है न.? बाप इसके बाद आगे भी तैयार है..क्या दृश्य है ..


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 25, 2012 at 8:13pm

तह-ए-दिल से शुक्रिया अनुज संजय मिश्र जी, आपको लघुकथा पसंद आई मेरा श्रम सार्थक हुआ. 

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