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सानिध्य में सुदूर

 

      सानिध्य में सुदूर हर बात से मजबूर 
      सजग चिंतित, विराग अनुराग !
      प्रतिकूल  मंचन, मुलाक़ात सज्जन 
      फिर वहीँ आचार विचार संचन !
      दिशाहीन नाव, अथाह सागर 
      मस्ती तूफ़ान ज्यों यादगार मगर !
      अद्वैत, असहाय , निरुपाय 
      कुमकुम  की कली तेज धुप अलसाय !
      मधुर मिलन फिर वही चिंतन 
      अनुराग अपार तेजधार बहाव !
      धूमिल क्षितिज , कलरव 
      अभिनव राग हज़ार बार !
      हरित निष्प्राण मंद वायु यार
      व्यक्त-अव्यक्त निशावार हार !
      उधेड़बुन मनलय कोपल किसलय
      द्वैत-अद्वैत तलाश अविनाश !
      मनरत, कर्मरत अवकाश निवास
      विहार-विचरण हार- बगार !
      फिर वही द्वंद्व नभ तारे धरा
      जल, थल, नभ हर जीव हरा !
      कहाँ शक्ति संचित ज्वाला
      अजन्मी, अव्यक्त विदेह बाला !! 

       

      

      

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Comment

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Comment by Raj Tomar on June 29, 2012 at 6:04pm

आदरणीय योगराज सर, बहुत बहुत धन्यवाद आपका. :)


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 29, 2012 at 5:12pm

अति सुन्दर शब्द संयोजन, उत्तम अभिव्यक्ति. साधुवाद स्वीकार करें भाई राज तोमर जी.

Comment by Raj Tomar on June 23, 2012 at 11:05pm

श्रीमान सौरभ पाण्डेय जी , आभारी हूँ मैं आपकी शुभेच्छाओं और आशीर्वाद का. :)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 23, 2012 at 11:00pm

रचनाधर्मिता को धारते शब्द दिशायुक्त हो समरस बनें.   सरस प्रयास है. 

शुभेच्छाएँ.

Comment by Raj Tomar on June 22, 2012 at 10:26pm

कुशवाहा साब एवं योगी जी, प्रसंशा करने के लिए आपका आभारी हूँ. :)

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 22, 2012 at 4:13pm

१२३

४५६

११ १२ १३

रहता रचना का इन्तजार

बधाई आपको है हजार  

Comment by Yogi Saraswat on June 22, 2012 at 4:07pm

फिर वही द्वंद्व नभ तारे धरा
      जल, थल, नभ हर जीव हरा !
      कहाँ शक्ति संचित ज्वाला
      अजन्मी, अव्यक्त विदेह बाला !!

बहुत खूब , राज तोमर जी ! सुन्दर अभिव्यक्ति

Comment by Raj Tomar on June 21, 2012 at 8:22pm

मैं आप का हृदय की गहराइयों से आभारी हूँ. रेखा जोशी जी ,अविनाश जी, राजेश कुमारी जी एवं अलबेला साब. ऐसे ही हौसला अफजाई करते रहिये . :)

Comment by Rekha Joshi on June 21, 2012 at 4:29pm

राज तोमर जी ,

फिर वही द्वंद्व नभ तारे धरा
      जल, थल, नभ हर जीव हरा !,अति सुंदर शब्दावली से सजी हुई रचना ,बधाई 
Comment by AVINASH S BAGDE on June 21, 2012 at 3:38pm

      अद्वैत, असहाय , निरुपाय 

      कुमकुम  की कली तेज धुप अलसाय !

 

 कहाँ शक्ति संचित ज्वाला 
      अजन्मी, अव्यक्त विदेह बाला !! 

bahut umda Raj bhai.द्वैत-अद्वैत तलाश अविनाश !
      मनरत, कर्मरत अवकाश निवास ...wah.

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