For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हर दिन बन कर मलयज बयार 

सब पर होती रहती निसार

माँ से मिलतीं खुशियाँ हजार l

 

वो बन कर ममता की बदरी 

भरती रहती जीवन-गगरी   

छाया बन कर धूप-शीत में

बन जाती संबल की छतरी   

हर बुरी नजर देती उतार l

 

वो है बाती की स्वर्ण-कनी

हर दुख को सह लेती जननी 

पलकों पर सदा बिठाती है

बच्चे होते कच्ची माटी से

ढाले वो उनको ज्यों कुम्हार l

वो हृदय में रहे चाशनी सम 

स्नेह कभी ना होता कम 

सबकी खुशियों में रम कर 

छिपा के रखती अपने गम  

उसमें क्षमता भू सी अपार l

 

वो है तो है घर में बसंत

आँचल उसका निर्मल अनंत

स्पर्श है उसका मरहम सा

वह ही है जग का आदि अंत

अक्षत-रोली और पुष्प-हार l

 

वो घर के नभ में चंदा-तारा

उस जैसा ना कोई न्यारा

झिड़की देकर गले लगाती   

बन कर कश्ती और पतवार    

हर आफत करती दरकिनार l 

 

हर दिन बन कर मलयज बयार 

सब पर होती रहती निसार

माँ से मिलतीं खुशियाँ हजार l

 

-शन्नो अग्रवाल 

Views: 503

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Shanno Aggarwal on May 24, 2012 at 1:34am

बहुत-बहुत शुक्रिया...गणेश जी. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 23, 2012 at 8:41pm

//

झिड़की देकर गले लगाती   

बन कर कश्ती और पतवार   ///

वाह शन्नो दी , बहुत ही सही बात कही हैं, माँ ऐसी ही होती है |

Comment by Shanno Aggarwal on May 20, 2012 at 6:55pm

अशोक जी, रचना आपको पसंद आई इसके लिये आपका हार्दिक धन्यबाद. 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2012 at 8:32am

शन्नो जी सादर नमस्कार,
                             वो है बाती की स्वर्ण-कनी
                हर दुख को सह लेती जननी
                पलकों पर सदा बिठाती है
                बच्चे होते कच्ची माटी से
                ढाले वो उनको ज्यों कुम्हार l
आपकी माँ के प्रति सुन्दर अभिव्यक्ति से मन में माता के प्रति आदर में और वृद्धि होती है. बधाई.

Comment by Shanno Aggarwal on May 16, 2012 at 11:36pm

अजय जी, अरुण जी, हसरत जी एवं राजेश कुमारी जी, रचना की सराहना हेतु आप सभी का साभार धन्यबाद. 

और हसरत जी, शेर के लिये शुक्रिया...बहुत खूबसूरत है...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 15, 2012 at 8:30pm

शन्नो जी माँ सच  में ऐसी ही होती हैं कभी भुलाई नहीं जाती मात्र महिमा से सराबोर कविता की हार्दिक बधाइयां 

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on May 15, 2012 at 3:37pm

bahut khoob ahanno ji 

apki rachna ko padhkar ek sher yaad aa gaya

jiske bhi dil se maa ki mohabbat chali gayi

samjho ke uske haath se jannat chali gayi

Comment by Abhinav Arun on May 15, 2012 at 3:31pm

वो है तो है घर में बसंत

आँचल उसका निर्मल अनंत

स्पर्श है उसका मरहम सा

वह ही है जग का आदि अंत

अक्षत-रोली और पुष्प-हार

ऐसी हर माँ और उसकी ममता को नमन है आपको  is  रचना के लिए हार्दिक बधाई !!

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 15, 2012 at 2:06pm

Waah Shanno ji, bahut hi sundar....

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service