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::::: हाँ यहीं तो हो तुम ::::: © (मेरी नयी कविता)

हाँ यहीं तो हो तुम, और जा भी कहाँ सकती हो ...
तलाशते रहेंगे एक दूसरे में खुद को मगर ...
साये के साये में, साये को खोज पाएंगे कैसे ... ?
कोशिशें, तलाश, और यही ज़द्दोज़हद ढूंढ पाने की ...
जैसे खुद में दूसरा बाशिंदा बसा रखा हो हमने ...

गर हाथ थाम लेती जो तुम पास आकर मेरा ...
मौजूद साये को साये से अलहदा भी देख पाता ...
मगर ज़रूरत ही क्या तुम्हें अलहदा देखने की ...
तुम में समा कर मैं नज़र आता हूँ मैं से बेहतर ...

_____जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 23 सितम्बर 2010 )

Photography by : Jogendra Singh

_____________________________________
Note :- (( मेरी उपरोक्त रचना के बन जाने के पीछे जिस रचना ने प्रेरणा का कार्य किया है
वह नीलू पुरी जी द्वारा रचित एक कविता है , जिसका लिंक नीचे मौजूद है ))

http://www.facebook.com/note.php?note_id=412197984246&comments&...
एडमिन जी आप चाहें तो लिंक रहने दें अन्यथा इसे निकाल दें ...
_____________________________________


► यदि कुछ पसंद नहीं आया हो तो Please साफ़ बता दीजियेगा.. मुझे अच्छा ही लगेगा..
► !!..धन्यवाद..!!
.
_____________________________________

Views: 459

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Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 25, 2010 at 2:01pm
► नवीन भईया , ज़हमत तो क्या उठाई है ,,, बस दो मिनट लगे होंगे , और ये हाथ मेरे वर्कर का है और चित्र वसई बीच का है ...
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 25, 2010 at 2:00pm
बागी जी , हौसला अफजाई के लिए आपका शुक्रिया ...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 25, 2010 at 11:13am
बहुत खूब भाई जोगिन्दर जी,
तुम में समा कर मैं नज़र आता हूँ मैं से बेहतर ...
सुंदर कविता,
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 24, 2010 at 10:06pm
thanx @ Subodh , my friend ... :)
Comment by Subodh kumar on September 24, 2010 at 7:43pm
sunder jogi.. bahut khub...

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