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खूबसूरत सपनों नें
कितनी रातों को मुझे जगाया,
कंटीले रास्तों पर
बेतहाशा दौड़ाया,
बार-बार गिराया..
फिर भागने के लिए
सम्हल सम्हल उठना सिखाया,
और मैं भागती गयी...
घायल पैरों के
फूटे छालों से
रिसते लहू की
परवाह किये बिना
बस भागती गयी...
पर
हमेशा
सिर्फ दो कदम के फासले पर
मुस्कुराते रहे सपने ..
मुझे भगाते रहे सपने..
हाथ आते ही
फिर रूप बदल
सिर्फ दो कदम से
मुझे ललचाते रहे सपने..
एक न बुझने वाली अगन में
मुझे जलाते रहे सपने..
पर
आज ......
जैसे ही
मन फेर इन सपनों से,

मैं खड़ी हूँ स्वयं की सम्पूर्णता में आनंदित....
तो
ये बेचैन हैं
फूलों की चादर बन
मेरे कदमों तले
बिखर जाने को...
ये सहला रहे हैं
मेरे पैर
अपनी सुकून भरी
ठंडक से...
और
मैं मुस्कुरा रही हूँ
प्रकृति की इस गोपनीयता पर !

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 5, 2012 at 12:15pm

Heartfelt thanks dear Mahima Shree ji


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 5, 2012 at 11:14am

सुंदर काव्य-अभिव्यक्ति. बधाई स्वीकारें डॉ प्राची जी.

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 5, 2012 at 8:58am

खूबसूरत सपनों नें
कितनी रातों को मुझे जगाया,
कंटीले रास्तों पर
बेतहाशा दौड़ाया,
बार-बार गिराया..
फिर भागने के लिए
सम्हल सम्हल उठना सिखाया,

आदरणीया प्राची जी , सुन्दर काव्यात्मक प्रस्तुति. बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 4, 2012 at 6:29pm

प्रकृति और जीवन के अनोखे सपनो में बहुत सुन्दर तारतम्य स्थापित करती हुई  बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति बधाई 

Comment by आशीष यादव on May 4, 2012 at 5:56pm
वाह अति सुन्दर अभिव्यक्ति। इस सुन्दर रचना पर बधाई।
Comment by MAHIMA SHREE on May 4, 2012 at 5:09pm
मुस्कुराते रहे सपने ..
मुझे भगाते रहे सपने..
हाथ आते ही
फिर रूप बदल
सिर्फ दो कदम से
मुझे ललचाते रहे सपने..
एक न बुझने वाली अगन में
मुझे जलाते रहे सपने....
आदरणीय प्राची जी
सुंदर मनो अभिवयक्ति .. बधाई स्वीकार करें

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