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गीत -६ ( लक्ष्मण धामी "मुसाफिर")

रूठ रही नित गौरय्या  भी, देख प्रदूषण गाँव में।
दम घुटता है कह उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।
*
बीते युग की बात हुए हैं
घास-फूँस औ' माटी के घर।
सूने - सूने, फीके - फीके
खेतों खलिहानों के मञ्जर।।
*
अन्तर जैसे पाट दिया है, आज नगर औ' गाँव में।
दम घुटता है अब उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।
*
शेष हुए हैं देशी व्यञ्जन,
और  विदेशी  रीत  हुए।
तीजों - त्यौहारों से गायब,
परम्परा  के  गीत हुए।।
*
लगता  जैसे  आन  बसे  हों, किसी  विदेशी  ठाँव में।
दम घुटता है अब उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।
*
रिश्तों से अपनापन रूठा,
बिछड़ी हँसी ठिठोली है।
मोबाइल में बचपन खोया
शेष नहीं हमजोली है।।
*
स्वागत-अभिनन्दन बिसराकर, शूल चुभोते पाँव में।
दम घुटता है अब उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।
*
रीत नगर की अपना बैठे
आगन आगन भीत यहाँ।
कोयल मोर पपीहा चातक
नहीं सुनाते गीत यहाँ।।
*
कलरव जो भी कर्णप्रिय था, बदला कर्कस काँव में।
दम घुटता है अब उपवन की, छितरी-छितरी छाँव में।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 358

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 28, 2022 at 6:17am

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

औ' का प्रयोग छन्दों में भी कई जगह होते देखा है अतः प्रयोग किया है। उचित अनुचित के संदर्भ में आदरणीय भाई सौरभ जी से मार्गदर्शन की अपेक्षा है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 28, 2022 at 6:11am

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन। आपको गीत भाया, लेखन सफल हुआ। स्नेह के लिए आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 15, 2022 at 6:42pm

आदरणीय धामी जी बहुत सुन्दर गीत लगा...व्याकरण भी लिखे होने से थोड़ा ज्ञान वर्धन हो जाता है...आदरणीय एक-दो जगह "औ" शब्द का इस्तेमाल किया है...क्या छंदों में मात्रा पतन की इजाजत है?कृपया संशय दूर करें...सादर

Comment by Samar kabeer on December 14, 2022 at 3:25pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, अच्छा गीत लिखा आपने, बधाई स्वीकार करें I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 10, 2022 at 6:23pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on December 10, 2022 at 5:36pm
बहुत सुन्दर गीत, रिश्तों से अपनापन रूठा, बिछड़ी हंसी ठिठोली है..
..आंगन आंगन भीत यहां। सब बदल गया
राधे राधे

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