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करो जुर्म जमकर ये अन्धेर नगरी-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२


समझ मत उसे यूँ बुरा और होगा
तपेगा  दुखों  में  खरा और होगा।।
*
उजाला कभी जन्म लेगा वहाँ भी
अँधेरा कहाँ तक भला और होगा।।
*
रवैय्या है बदला यहाँ चाँद ने अब
रहेगा  कहीं  पर  पता  और होगा।।
*
लहू में है उस  के  वही साहूकारी
कहा और होगा लिखा और होगा।।
*
करो जुर्म जमकर ये अन्धेर नगरी
सजा को तुम्हारी गला और होगा।।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2022 at 2:57am

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल आपको अच्छी लगी लेखनसफल हुआ। उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए हार्दिकधन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2022 at 2:55am

आ. भाई जेतन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन , स्नेह और सुझाव के लिए हार्दिक हार्दिक आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2022 at 2:54am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 20, 2022 at 4:32pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। 

"लहू में है उस के वही साहूकारी

कहा और होगा लिखा और होगा" वाह.. लाजवाब।

Comment by Chetan Prakash on July 19, 2022 at 6:35am

आदाब  , भाई लक्ष्मण धामी मुसाफिर  बह्रे मुतकारिब  मुसम्मन सालिम में कही बढ़िया हुई गज़ल, बधाई ।तीसरे शे'र की शुरुआत  रवैया से होनी चाहिए,  न कि 'रवैय्या' से" ! आखिरी  शे'र को पढ़कर  मुझे अल्लामा इकबाल  याद आ गए,  "भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी / बड़ा बेअदब हूँ  सज़ा चाहता हूँ"!

Comment by Sushil Sarna on July 18, 2022 at 1:08pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई सर

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