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गाँव की धरती (कविता)

गाँव की धरती

गाँव की छवि अति निराली
शहर से छटा उसकी है न्यारी
गगनचुंबी से मुक्त धरा है होती
खुले आकाश सँग बातें ज्यादा है होती ।

सुबह सवेरे गाय बैल जगाते
दुग्ध धोने अपने ग्वाल को पुकारते

रुनझुन करती आती श्यामा
खुश हो जाती घर में दादी माँ

हल लेकर खेतो को निकलते
मेहनतकश पुरुष पसीना बहाते

बरगद नीम की छाँव तले बैठकर
खाते रोटी अचार चटनी प्याज मिलकर

हँसी ठट्ठा औ कोलाहल होता
हर घर से अपनापन है मिलता

सब कोई चाचा ताऊ हैं होते
दादी नानी सँग खेले पोते

खाना पीना सरल सात्विक है होता
न कोई यहाँ पिज़्ज़ा बर्गर है होता

सुनती हूँ आवाज़ कहीं से
लगता आती पुकार वहीं से

नदी किनारे बरगद कदम की डाली
विधाता होता है इसका माली

ले चल मन ऐसी ही जगह पर
मन नहीं लगता अब और कहीं पर।

  • स्वरचित, अप्रकाशित, अप्रसारित।

Views: 722

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 2, 2022 at 7:45am

सुप्रभात आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, हो जाता है। आप ने रचना पढ़ी यही बहुत है। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2022 at 8:27pm

आ. कल्पना बहन, शायद यह टिप्पणी लिखते समय  दिमाग किसी लघुकथा की ओर भटक गया लगता है। अन्यथा न लें। लिखना कविता ही था सादर....

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 1, 2022 at 8:16pm

धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण धामी जी पर मैंने तो कविता लिखी है लघुकथा ???

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 1, 2022 at 8:15pm

धन्यवाद आदरणीय समर भाई। आशा करती हूँ आप स्वस्थ होंगे!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2022 at 4:50pm

आ. कल्पना बहन, सादर अभिवादन। सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on May 1, 2022 at 2:46pm

अच्छी कविता लिखी है बहना, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 28, 2022 at 4:06pm

धन्यवाद आदरणीय सुशील सारना जी | आपको प्रस्तुति सुंदर लगी मेरा प्रयास सार्थक हुआ | प्रणाम आदरणीय| 

Comment by Sushil Sarna on April 28, 2022 at 1:33pm
वाह गाँव की पृष्ठभूमि पर बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीया जी । हार्दिक बधाई

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