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चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2

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चेहरे पर मुस्कान बनाकर बैठे हैं

जो नकली सामान बनाकर बैठे हैं

दिल अपना चट्टान बनाकर बैठे हैं

पत्थर को भगवान बनाकर बैठे हैं

जो करते बातें तलवार बनाने की

उनके पुरखे म्यान बनाकर बैठे हैं

आर्य, द्रविड़, मुस्लिम, ईसाई हैं जिसमें

उसको हिन्दुस्तान बनाकर बैठे हैं

ब्राह्मण-हरिजन, हिन्दू-मुस्लिम सिखलाकर

बच्चों को हैवान बनाकर बैठे हैं

बेच-बाच देगा सब, जाने से पहले

बनिये को सुल्तान बनाकर बैठे हैं

हुआ अदब का हाल न पूछो कुछ ऐसा 

पॉण्डी को गोदान बनाकर बैठे हैं

जाने कैसा ये विकास कर बैठे हम

वन को रेगिस्तान बनाकर बैठे हैं

जो कहते थे हर बेघर को घर देंगे

घर को कब्रिस्तान बनाकर बैठे हैं

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(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 25, 2021 at 6:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Aazi Tamaam जी 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 25, 2021 at 6:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी

Comment by Aazi Tamaam on April 25, 2021 at 5:33pm

छठा शैर बेहद पसंद आया

सादर प्रणाम आदरणीय धर्मेंद्र अच्छी ग़ज़ल है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 25, 2021 at 4:02pm

आ. भाई धर्मेंद्र जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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