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कहाँ इतना आसान होता है
किसी बात का अर्थ निकालना
हर भाव की व्याकरण अलग होती है
हर कोई अपने हिसाब से
हर भाव के अर्थ साधने का प्रयास करता है
किसी के लिए जिन्दगी का अर्थ
साँसों का चलायमान होना है
किसी के लिए साँसों के बाद है जिन्दगी
अधरों की मुस्कान के पीछे दर्द मुस्कुराते हैं
बिना दृग जल के भी क्रंदन होता है 10
वस्तुतः दृष्टि और सोच का तारतम्य ही
अर्थ को मूर्त रूप देता है
स्त्री को हम किस रूप में देखते हैं
माँ, बहन, पत्नी, सखा या मात्र भोग्या
जैसा भाव वैसा
ही अर्थ व्यवहार को साकार करता है
ब्रह्मांड की सीमा हो शायद
पर सृष्टि में
शायद
अर्थ की कोई थाह नहीं
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on February 10, 2021 at 8:24pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब, सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार। अन्य पोस्टों पर जितना भी संभव होगा मैं अपनी प्रतिक्रियाएं देने का प्रयास करूँगा। सुझाव के लिए हार्दिक आभार और असुविधा के लिए क्षमा।

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2021 at 8:23pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी , सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2021 at 9:50pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 6:11pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।मंच पर आई रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रया दिया करें ।

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