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परिंदा तिफ़्ल हो उसके भी पर तो रहते हैं(११० )

(1212 1122 1212 22 /112 )

.

परिंदा तिफ़्ल हो उसके भी पर तो रहते हैं
ग़रीब हो भले ख़्वाबों में घर तो रहते हैं
**
भले ही ज़िंदगी हासिल हुई अमीरों सी
मगर उन्हें भी कुछ अन्जाने डर तो रहते हैं
**
हुआ है बंद कभी एक रास्ता मत डर
खुले कहीं न कहीं और दर तो रहते हैं
**
मिला न एक सुबू गाँव में तमन्ना का
भले ही हसरतों के कूज़ा-गर  तो रहते हैं
**
सताए धूप मुसीबत की ,छाँव कर देंगे
हर एक घर में पुराने शजर तो रहते हैं
**
भुलाना जान के ऐबों को अपने ठीक नहीं
कि ऐब दीदा-ए-अहल-ए-नज़र तो रहते हैं
**
है अब भी  मुल्क में जारी तिजारत-ए-पैकर
हवस के आज तलक सौदा-गर तो रहते हैं
**
दिखाए ख़ौफ़ जो बच्चों को मान कर चलिए
तमाम उम्र कुछ उनके  असर तो रहते हैं
**
हमेशा फैसले के वक़्त ग़ौर कर लें 'तुरंत '
हयात भर ही  कुछ अगर और  मगर तो रहते हैं
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 16, 2020 at 3:47pm

Anvita जी , Dimple Sharma जी , Ravi Shukla जी , रचना पर उपस्थित होकर सराहना के लिए सादर आभार | 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 16, 2020 at 3:23pm

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' साहिब, आपको इस लाजवाब ग़ज़ल पे ढेरों बधाई। मतले से लेकर मक़्ते तक हर शे'र में कोई गहरा फ़लसफ़ा है या कोई गंभीर मुद्दआ उठाया है आपने। आदरणीय, मतले में 'ख़्वाबों' में, चौथे शेर में 'कूज़ा-गर' में, और मक़्ते में 'फ़ैसले' में नुक़्ते छूट गए हैं।

/भुलाना जान के ऐबों को अपने ठीक नहीं
कि ऐब दीदा-ए-अहल-ए-नज़र तो रहते हैं/
छटे शे'र में 'में' की कमी महसूस हुई: ऐसा लगता है कि 'ऐब नज़र वालों की नज़र में रहते हैं' होना चाहिए। बाक़ी हो सकता है मेरे समझने में कमी हो।

सातवें शेर के ऊला में 'अभी है' की जगह 'है अब भी' कह कर देखियेगा, शायद आपको ज़ियादा उचित लगे:

1212  /  1122  /  1212  /  22 (112)
है अब भी मुल्क में जारी तिजारत-ए-पैकर
हवस के आज तलक सौदा-गर तो रहते हैं

आठवें शेर के सानी में 'इनके' की बजाए 'उनके' कह कर देखियेगा, हो सकता है आपको ज़ियादा उचित लगे:

1212  /  1122  /  1212  /  22 (112)
दिखाए ख़ौफ़ जो बच्चों को मान कर चलिए
तमाम उम्र कुछ उनके असर तो रहते हैं

मक़्ते के सानी मिसरे में 'कुछ अगर' बह्र में नहीं लग रहा, आदरणीय:
1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)
/हमेशा फैसले के वक़्त ग़ौर कर लें 'तुरंत '
सभी की ज़ीस्त में कुछ अगर मगर तो रहते हैं/

अगर आपको मुनासिब लगे तो इस मिसरे को यूँ कहा जा सकता है:
1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)
हर एक दिल में अगर और मगर तो रहते हैं

Comment by Samar kabeer on June 16, 2020 at 2:56pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'सभी की ज़ीस्त में कुछ अगर मगर तो रहते हैं'

इस मिसरे की बह्र चेक करें ।

Comment by Ravi Shukla on June 16, 2020 at 2:35pm

वाह वाह बहुत उम्‍दा गजल कही आदरणीय गिरधारी सिहं जी मुबारक बाद पेश है ।

मिला न एक सुबू गाँव में तमन्ना का
भले ही हसरतों के कूजा-गर तो रहते हैं
**
सताए धूप मुसीबत की छाँव कर देंगे
हर एक घर में पुराने शजर तो रहते हैं

 ये दो शेर बहुत अच्छे लगे । 

Comment by Dimple Sharma on June 16, 2020 at 12:40pm

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत'तुरंत'जी नमस्ते, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय बधाई स्वीकार करें।
प्रणाम

Comment by Anvita on June 16, 2020 at 10:53am
आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत"तुरंत "जी,सादर प्रणाम ।आपकी रचना बहुत ही अच्छी लगी ।कृपया बधाई स्वीकार करें ।

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