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ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त

बह्र-फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फैलुन

मुँह अँधेरे वो चला आया मेरे घर कमबख्त
आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कमबख्त

इस समय खौफजदा लगती है दुनिया सारी
सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्त

चाहता हूँ मैं उड़ूँ नील गगन मे लेकिन
साथ देते ही नहीं अब मेरे ये पर कमबख्त

बन के तूफान चला आया शहर के अन्दर
कर गया कितनों को बरबाद समन्दर कमबख्त

लाख चाहूँ मैं उसे मुट्ठी में कर लूँ लेकिन
दो कदम दूर ही रहता है मुकद्दर कमबख्त

वो भी कहता है कि पहुँचा हुआ साधू है वो
हाथ में ले के जो चलता फिरे खंजर कमबख्त़

मिन्नतें लाख करूँ हाथ भी जोड़ूँ लेकिन
मेरी अर्जी पे करे गौर न अफसर कमबख्त

जानता कुछ भी नही खुद को वो समझे दानिश
सारी दुनिया को समझता है वो कमतर कमबख्त

मुद्दतों से जो कई राज छुपा रक्खे थे
ले गया राज वो सब दिल में उतरकर कमबख्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 30, 2020 at 4:13pm

आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी, आदाब। दमदार अश'आ़र से मुज़ैय्यन शानदार ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें।

"सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्त" और

"वो भी कहता है कि पहुँचा हुआ साधू है वो"  मिसरों में आपने "हुआ" को 1 1 पर लिया है, अगर बहतर लगे तो यूँ भी कर सकते हैं :

(1) सबके सीने में समा बैठा कोई डर कमबख्त,

(2) सब उसे कहते हैं साधू है बड़ा पहुँचा वो.    सादर। 

Comment by Samar kabeer on May 30, 2020 at 2:48pm

जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

कमबख्त

बन के तूफान चला आया शहर के अन्दर'

इस मिसरे में 'शह्र' को आपने 12 पर लिया है,जबकि उर्दू शाइरी में इसे 21 पर लेना उचित होता है,देखियेगा ।

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