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सुखद एकान्त है या है अकेलापन

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास

 

खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी

जाने क्यूँ उसे हमेशा

होती है जाने की जल्दी

आती है, चली जाती है

आ..ती  है 

आलोप हो जाती है

 

कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर

रुक गया है मेरी छत पर मानो

कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह

दर्द की अवधि समाप्त नहीं होती

 

इस कोने, उस कोने, उथल-पुथल में भी

दर्द सर्व व्यापि, सिधान्तहीन

हृदय में घर बनाए रहता है

कि जैसे वह दो दिन का महमान न हो

मालिक-मकान हो

मेरा हृदय मानो उसका नियमित स्थान हो

 

कोई एक दर्द गहरा

टूटे बुझे गिरे तारे-सा

एक ही दर्द बेशुमार हो मानो

बढ़ती रहती हैं आशँकाएँ भीतर

ठगने को मुझको

नित्य ओढ़े नया रूप नया स्वर

कि जैसे ऐसे में मैं उनको पहचानूँगा नहीं

परन्तु दर्द तो ’बहुत’ अपना है

मन कैसे उसे पहचानेगा नहीं 

 

दिन नहीं अक्सर वत्सर बीत जाते हैं

’साधारण’ और”सामान्य’ का मूल्याँकन करते

क्या करेँगे हम ऐसे गणित से प्रमाणित

कि अपने ही निर्माणित गणित में ’इकाई’ बने

हम देते हैं फूल औरों को खुश करने को

हासिल रह जाते हैं अपने लिए सिर्फ़ काँटे

बचा रह जाता है जो इस गणित के हल के बाद

वह  "सुखद एकान्त"  नहीं

ज़हरीला दर्दीला  "अकेलापन"  कहलाता है

 

... विजय निकोर

मोलिक व अप्रकाशित रचना

Views: 128

Comment

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Comment by vijay nikore on January 17, 2026 at 8:37am

नमस्ते, सुशील जी। 
आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 13, 2026 at 1:44pm

आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की हर परत को कुरेद डाला है । एकांत साकार हो गया । इस बेहतरीन 👌 प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई सर । 

Comment by vijay nikore on January 12, 2026 at 11:50am

प्रिय अशोक कुमार जी,
रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार।

-- विजय

Comment by vijay nikore on January 12, 2026 at 11:48am

नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।         
प्रयास करूँगा कि अब आता रहूँ। रचना को मान देने के लिए आभार।                                       

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 9:44pm

     

तरू तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास.......प्रकृति यहाँ सभी को एक अवसर पर एकांत में धकेल ही देती है. वृक्षों पर पतझड़ पश्चात बसंत आता है वह हरा हो उठता है.  मनुष्य को भी जीवन  से पतझड़ को दूर करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए. सुन्दर और भावपूर्ण रचना के लिए आपको बहुत बधाई. सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 5, 2026 at 11:41pm

आदरणीय विजय निकोर जी, एक अरसे बाद आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ. एकान्त और अकेलापन के बीच के अन्तर को रचना विह्वलता के साथ प्रस्तुत करती है. हार्दिक बधाई 

शुभ-शुभ

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