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उसने मुझको देखा है,
शायद कुछ तो सोचा है।
मंज़र कुछ ऐसा है जो,
उसकी आँखों देखा है।
मुश्क़िल राहों पे अब वो,
धीरे-धीरे चलता है।
कहता है वो सच को सच
सबको कड़वा लगता है।
उस पे शक़ करना कैसा,
वह तो जाँचा परखा है।
सुख-दुख के मौसम को, वह
ख़ामोशी से सहता है।
बारिश हो जाने से अब,
मौसम बदला-बदला है।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on February 23, 2017 at 5:39pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 8:16am

आदरणीय मो. आरिफ भाई , छूती बहर मे अच्छे शेर निकाले हैं , अच्छी गज़ल हुई है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on February 20, 2017 at 5:38pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय शिज्जू शकूर साहब ।
Comment by Mohammed Arif on February 20, 2017 at 5:37pm
हृदय तल से आभार आदरणीया नीलम उपाध्य जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by Mohammed Arif on February 20, 2017 at 5:33pm
दिली आभार आदरणीय समर कबीर साहब ।
Comment by Mohammed Arif on February 20, 2017 at 5:32pm
दिली आभार आदरणीय गुरप्रीत जी ।
Comment by Mohammed Arif on February 20, 2017 at 5:31pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आदाब,बहुत-बहुत शुक्र गुजार हूँ आपका कि आपने शीर्षक दुरुस्त कर दिया । ख़ैर मकदम !
Comment by Gurpreet Singh jammu on February 20, 2017 at 2:28pm

जनाब मोहम्मद आरिफ जी,,, आपकी ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद आई,,, सारी ग़ज़ल शानदार लगी..
मुश्क़िल राहों पे अब वो,
धीरे-धीरे चलता है।
उस पे शक़ करना कैसा,
वह तो जाँचा परखा है।
सुख-दुख के मौसम को, वह
ख़ामोशी से सहता है।
बारिश हो जाने से अब,
मौसम बदला-बदला है।
यह अशआर बहुत ज़्यादा पसंद आए ,,, इस ग़ज़ल के लिए आपको बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on February 20, 2017 at 2:02pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 20, 2017 at 12:03pm

ग़ज़ल अच्छी हुई है मोहतरम जनाब आरिफ साहब

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