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कभी इबादते-गुज़र

कभी इबादतें-गुज़र, कभी मयपरस्ती है जवानी में,
कभी ठण्ड हैं महताब जैसी, कभी आग हैं पानी में!

कभी ख्याले-बुतां, कभी खौफ़े-खुदा हैं जिंदगानी में,
बस यही दो ख्याल रहे हैं इस जिस्म-ए-फ़ानी में!

मैं जख्मी हो जाता हूँ सुनके उनके लफ्ज़-ए-तंग,
एक जंग सी जीतनी होती हैं उनसे बात बनानी में!

तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 11, 2018 at 4:27am

बहुत बढ़िया पेशकश। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं मुहतरम जनाब तारिक अज़ीम ''तन्हा"  साहिब।

Comment by Samar kabeer on April 10, 2018 at 6:21pm

जनाब तारिक़ अज़ीम 'तन्हा' साहिब आदाब,मंच पर आपका स्वागत है,आसार ये बता रहे हैं कि आपने ग़ज़ल लिखने का प्रयास किया है,लेकिन इसके लिए अभी आपको समय लगेगा,ओबीओ पर ग़ज़ल से सम्बंधित बहुत से आलेख हैं,उनका अध्यन कीजिये,ग़ज़ल के साथ नाम के नीचे आपने मौलिक और अप्रकाशित भी नहीं लिखा?ये इस मंच का नियम है,बाक़ी जनाब निलेश जी की बात पर भी ध्यान दें ,इस प्रस्तुति के लिए बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 10, 2018 at 2:43pm

आ. अज़ीम साहब,
विधा का नाम और यदि सछंद रचना है तो छंद का मात्रिक क्रम अथवा अरकान लिख दिया कीजिये जिससे नए सीखने वालों को आसानीं रहेगी ..
सादर 

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