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ग़ज़ल : न मुश्किल बढ़ा आजमाने से पहले

                 

122 – 122 – 122 - 122

               

न मुश्किल बढ़ा आजमाने से पहले

नजर को मिला दिल लगाने से पहले

 

सफ़र ज़िन्दगी का रहा फिर अधूरा

खुदा याद आया न जाने से पहले

 

वो दिन रात हलकान पैसे में देखो

करे मोल बाज़ार आने से पहले

 

तुम्हे भी तो आखिर यही सब मिलेगा

जरा सोच लो तुम सताने से पहले

 

मुहब्बत में शर्तें तो होती नहीं हैं

सही पाठ पढ़ लो ज़माने से पहले   

.

गयी उम्र सारी कमाने में लेकिन

हुई खर्च सबको दिखाने से पहले

 

है महबूब अपना अनोखा सभी से

गिलौरी चबाए निशाने से पहले

.        

              

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 7:00pm

वाह  बहुत  बढ़िया ग़ज़ल है हार्दिक बधाई लीजिये |आद० गिरिराज जी की बात से मैं भी सहमत हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 1, 2016 at 9:31am

आदरणीय मुनीष भाई , अच्छी ग़ज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ आपको । बस अंतिम शेर ऐसा कुछ कह नही पा रहा है , जिसे कहना ज़रूरी हो ।

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on June 30, 2016 at 4:33pm

मुनीश जी रचना पर मेरी हार्दिक बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 30, 2016 at 3:10pm

आदरणीय मुनीश जी इस रचना पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर बधाई के साथ 

कृपया ध्यान दे...

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