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नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ (६६)

(१२२२ १२२२ १२२ )

.

नकेलें ग़म के मैं नथुनों में डालूँ
ख़ुदाया मैं भी कुछ खुशियाँ मना लूँ
**
मुझे भी तो अता कर चन्द मौक़े
ख़ुदा मैं भी तो जीवन का मज़ा लूँ
**
मुहब्बत में तिरी है जीत पक्की
भला फिर किसलिए सिक्का उछालूँ
**
हवा जब खुशबुएँ बिखरा रही है
ख़लल क्यों काम में बेकार डालूँ
**
पुराने दोस्त क्या कम हैं किसी से
नये क्यों आस्तीं में मार* पालूँ (साँप )
**
मुसीबत आ गई मेहमान बनकर
बता कैसे ख़ुदा घर से निकालूँ
**
ख़ुमारी चढ़ गई आँखों की मय की
भला अब होश मैं कैसे सँभालूँ
**
तुझे जब क़त्ल करना ही है मुझको
मिरी हिम्मत कहाँ ख़ुद को बचालूँ
**
'तुरंत ' आये क़ज़ा अपनी रजा से
नहीं बस में कि जब चाहे बुला लूँ
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Samar kabeer on October 14, 2019 at 12:02pm

 // मेहमान  को वजन में अधिकतर सुख़नवरोँ के कलाम में २२१ ही देखा है २१२१ नहीं | इतना ही नहीं जिस भी लफ्ज़ में दूसरा अक्षर "ह" होता है उसमें उससे पहले के अक्षर की एक मात्रा गिरती हुई देखी है | जैसे मेहरबानी =१२२२ ,मोहलत =२२ , मेहनत =२२ , ज़ेहन =२१ , शोहरत =२२ , आदि | //

भाई 'ह' के पहले वाले अक्षर की मात्रा गिराने की ज़रूरत ही क्या है,आपने इस तरह के जितने शब्द उदाहरण में लिखे हैं,उनका सहीह उच्चारण देखिये:-

'मेहमान'--"महमान"

'मेहनत'--"मिहनत"

''ज़ेहन'--"ज़ह्न"

'शोहरत'--"शुहरत" 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 13, 2019 at 6:54pm

आदरणीय Samar kabeer साहेब ,आदाब , आपकी पृरखलुस हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया |  मेहमान  को वजन में अधिकतर सुख़नवरोँ के कलाम में २२१ ही देखा है २१२१ नहीं | इतना ही नहीं जिस भी लफ्ज़ में दूसरा अक्षर "ह" होता है उसमें उससे पहले के अक्षर की एक मात्रा गिरती हुई देखी है | जैसे मेहरबानी =१२२२ ,मोहलत =२२ , मेहनत =२२ , ज़ेहन =२१ , शोहरत =२२ , आदि | कृपया इस बारे में कोई जानकारी है तो प्रदान करें | 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on October 13, 2019 at 6:47pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी , रचना की सराहना के लिए सादर आभार 

Comment by Samar kabeer on October 13, 2019 at 2:56pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'मुसीबत आ गई मेहमान बनकर'

इस मिसरे में 'मेहमान' को "महमान" कर लें,क्योंकि 'मेहमान' का वज़्न 2121 है ।

Comment by Shyam Narain Verma on October 12, 2019 at 5:23pm
प्रणाम आदरणीय, बहुत ही उम्दा प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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