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जब तू पैदा हुई थी

तो मैं झूम के नाचा था
मेरी गोद में आकर

जब तूने पलकें झपकाई
मैंने अप्रतिम प्रसन्नता क़ो

अनुभव किया था
फ़िर तू शनै शनै

बेल की तरह बड़ी होने लगी
तेरे हाथ पीले करने की

मुझे फ़िक्र होने लगी
औऱ आज खुशियाँ की

बारात आ रही है
मेरी लाड़ली मुझे छोड़

गैरों के घर जा रही है
आज मैं पलकें झपकाउंगा

मगर आँसू छिपाने के लिए


- प्रदीप देवीशरण भट्ट - मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on June 25, 2019 at 11:19am

जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'जब तूने पलकें 'झपकाई'--"झपकाईं"

'औरआज खुशियाँ की'--"ख़ुशियों की"

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