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उस से मिलकर तुझे हुआ क्या है ।
पूछते लोग माजरा क्या है ।।

सच बताने पे आप क्यूँ रोये ।
आइने से हुई ख़ता क्या है ।।

है तबस्सुम का राज क्या उनके ।
आंख में गौर से पढा क्या है ।।

अश्क़ हैं बेहिसाब हिस्से में ।
ज़श्न के वास्ते बचा क्या है ।।

इस तरह रोकिये नहीं मुझको ।
पूछिये मत मेरा पता क्या है ।।

आप मतलब की बात करते हैं ।
आपके साथ फायदा क्या है ।।

छोड़िये बात आप भी उसकी ।
उसकी बातों में अब रखा क्या है ।।

गर्म चर्चा है दिलब है जलाने की ।
देखिए फिरव धुँआ उठा क्या है ।।

जी रहा हूँ तमाम गर्दिश में ।
अब सिवा इसके रास्ता क्या है ।

चाँद निकलेगा उस दरीचे से ।
आसमाँ को तू देखता क्या है ।।
नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by राज़ नवादवी on October 11, 2017 at 2:17pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. 

सच बताने पे आप क्यूँ रोये ।
आइनों से हुई ख़ता क्या है ।।

वाह वाह. 'आइनों' को आइने करना बेहतर होगा. कुछ टंकण के भी दोष हैं, सही कर लें. सादर 

Comment by Mohammed Arif on October 11, 2017 at 11:44am
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र माकूल है । शे'र दर शे'र शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
नोट:- कितना अच्छा हो यदि आप जैसे निष्णात ग़जलगो साहित्य की अन्य विधाओं पर भी अपनी सृजनशीलता का परिचय देने वालों को भी अपनी टिप्पणियों से पोषित करें ताकि उनका उत्साहवर्धन हो सके ।
Comment by Afroz 'sahr' on October 11, 2017 at 10:41am
आदरणीय नवीन जी इस रचना पर बधाई आपको । टंकण त्रुटियाँ बहुत हें इन्हें सही करलें ।

कृपया ध्यान दे...

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