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लो फिर चुनाव आ गये.

लो फिर चुनाव आ गये.

हम हर दल के नेता को भा गए.

‘दल-दल’ से निकल कर सब नेता,

शहर-गाँव में आ गये.

कोई मोबाइल, लैपटॉप दे रहा.

कोई दे रहा दाल घी,

खुले आम दरबार लगा है,

चाहे जितना खा और पी.

पांच साल हमने भोगा है,

कुछ दिन तुम भी लो भोग.

चुनावी वादें है, वादों का क्या,

समय के साथ भूल जाते है लोग.

गरीबों का हक हम खा गये,

लो फिर चुनाव आ गये.

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Naval Kishor Soni on February 3, 2017 at 12:59pm

Thanks आदरणीय गिरिराज भंडारी ji


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Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 10:11am

आदरणीय नवल भाई , चुनावी माहौल  पर अच्छी कविता रची है , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Naval Kishor Soni on February 2, 2017 at 12:10pm

 Thanks laxman dhami sir.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 11:50am

चुनावी माहौल पर अच्छी कविता हुई है, बधाई स्वीकारें l

Comment by Naval Kishor Soni on January 31, 2017 at 10:26am

Thanks Janab Samar Kabeer ji.

Comment by Samar kabeer on January 30, 2017 at 10:17pm
जनाब नवल किशोर सोनी जी आदाब,चुनावी माहौल पर अच्छी कविता है, बधाई स्वीकार करें ।

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