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चलना ही सीखना है तो ठोकर तलाश कर (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212

दुनिया को छोड़ पहले ख़ुद अंदर तलाश कर
ऊंचे से इस मकान में इक घर तलाश कर

हमवार फ़र्श छोड़ के पत्थर तलाश कर
चलना ही सीखना है तो ठोकर तलाश कर

ख़ुद को जला के देख जो सच की तलाश है
किस ने तुझे कहा कि पयम्बर तलाश कर

हरियालियां निगल के उगलता है कंकरीट
इस वक़्त किस तरफ़ है वो अजगर, तलाश कर

तेरा सफ़र में साथ निभाए तमाम उम्र
ए ज़ीस्त कोई ऐसा भी रहबर तलाश कर

*जय* प्यास ही से प्यास का मिट सकता है वजूद
ऐसा भी क्या हमेशा समंदर तलाश कर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 9:33am

आदरणीय अच्छी अज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ आपको ।
पर्वर्तन के लिये मै , आ. समर भाई की सलाह का अनुमोदन करता हूँ , बहुत सटीक  सलाह है .. बाक़ी आप स्वतंत्र हैं ।

Comment by Samar kabeer on December 1, 2016 at 10:47am
"तू इसके वास्ते न समंदर तलाश कर"
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 1, 2016 at 10:40am

वही अर्थ रखना हो तो इस तरह भी कर सकते हैं

ऊ‍ँचे मकान छोड़ तू इक घर तलाश कर

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 1, 2016 at 2:21am

आदरणीय समर कबीर जी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी,बहुत बहुत धन्यवाद आपलोगों को।

मैं उक्त मिसरा ए सानी की जगह पर प्रस्तुत मिसरा रखने पर आपलोगों का अनुमोदन चाहता हूँ-

"मत वक़्त ज़ाया कर तू समंदर तलाश कर"

ये कैसा रहेगा?

सादर!!

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 1, 2016 at 2:18am

आदरणीय डॉ गोपाल जी, हार्दिक धन्यवाद आपको।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2016 at 11:28am

आ० भाई जयनित जी सूंदर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकारें l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 27, 2016 at 11:30pm

आदरणीय जयनित जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 27, 2016 at 7:28pm

आदरणीय बहुत सुन्दर ...............बधाई 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 27, 2016 at 6:53pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय जयनित जी। दाद कुबूल करें। समर साहब से सहमत हूँ।

Comment by Samar kabeer on November 26, 2016 at 10:52pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
मक़्ते के सानी मिसरे से मैं इत्तिफ़ाक़ नहीं करता,ऊला और सानी में रब्त नहीं हो रहा है,बहुत बारीक नुक्ता बता रहा हूँ,आपकी रदीफ़ बहुत मुश्किल है'तलाश कर',मेरा सुझाव है कि सानी मिसरा यूँ कर लें:-
"तू इसके वास्ते न समंदर तलाश कर"

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