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मानवता के लिये जियो-पंकज

बहुत प्रताप था सम्राट अशोक
अब कहाँ है तुम्हारा सिंहासन?

बहुत जलवा था ज़िल्ले इलाही
कहाँ हैं अब मुग़लिया वंशज ?

जो महल जो हीरे जवाहरात
तूने खून से जुटाए थे न !
कोह-ए-नूर तो शो पीस ही रह गया
बादशाह सलामत?

तेरी खून पीने वाली तलवार
टीपू सुल्तान
बिक गयी- नीलाम हो गयी।
लेकिन तेरी वंशावली के
बूते की बात नहीं रही।।

गफ़लत में जीते हुए मौत से हारकर
सारी हेकड़ी और कौशल यहीं छोड़कर
जाना पड़ा तुमको भी महाराज युधिष्ठिर।

कुरुक्षेत्र की लाल धरती
पानीपत का खूनी मैदान
प्लासी का रण क्षेत्र
हल्दी घाटी का युद्ध स्थल
सब बस कहानी हैं अब।।

हे मानव तू जो बीन-बटोरकर
चोरी-बेईमानी से यह सब
इकठ्ठा कर रहा है;

नेपाल में भी लोगों नें एकत्र किया था
काठमांडू याद है न ?

संग्रहण का त्याग करो
परहित पुरुषार्थ करो

प्लूटो अरस्तू और विवेकानन्द
शंकराचार्य और तमाम स्वामी आनंद
महात्मा बुद्ध और महावीर

नाम याद तो हैं न ?

न्यूटन आर्किमिडीज़ और भी
वैज्ञानिक-ऋषि

मानवता के लिए जियो
सदियों तक जियो।।


मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 3, 2016 at 11:41am
आदरणीय गोपाल सर सादर प्रणाम।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2016 at 8:41pm

बहुत बेहतरीन तंज है आ० पंकज जी  पर अहम् में डूबा व्यक्ति अंधा ही होता है . सादर .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 2, 2016 at 4:55pm
आदरणीय राजेश दीदी, सादर प्रणाम और आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 6:43pm

पुरातन से नवीन को नसीहत देती हुई बढ़िया प्रस्तुति है आद० पंकज जी बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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