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बहुत खुश हैं हम अपने बोरिये पर (ग़ज़ल)

1222 1222 122

बिछाया जिसने कंकड़ रास्ते पर
वो क्यों चुपचाप है इस हादिसे पर

अना के बदले सबकुछ मिल रहा था
हमीं राज़ी नहीं थे बेचने पर

हमारे पाँव में जब मोच आई
थी मंज़िल कुछ क़दम के फासले पर

ज़ुबाँ सिल ले, जिसे है जान प्यारी
कटेंगे सर यहाँ, सच बोलने पर

अधिष्ठाता वही इस देश के हैं
अभी तक जो रहे हैं हाशिये पर

मकाँ तब्दील हो जाता है घर में
डिनर पर, या सवेरे नाश्ते पर

बिठाए आपको पलकों पे दुनिया
बहुत खुश हैं हम अपने बोरिये पर

हज़ारों जुगनुओं के बीच में भी
हमारा ध्यान है बुझते दिये पर

ग़ज़ल कहते इक अरसा हो गया है
अटक जाता हूँ फिर भी काफ़िये पर

मेरा दिल, खिलखिलाता एक बच्चा
जो गुमसुम हो गया है डाँटने पर
===========================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 552

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on June 22, 2016 at 10:16am
आ. श्याम नारायण वर्मा जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपको।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 22, 2016 at 12:19am

भाई जयनित, ग़ज़ल आपकी सही है. लेकिन मैं मतले से बहुत संतुष्ट नहीं हो पाया. कंकड़ शब्द जातिवाचक के तौर समूहवाचक का होते हुए कंकड़ ही रहेगा. अतः इसका बहुवचन कंकड़ ही रहेगा. फिर क्रिया बिछाये हो जायेगी न ?

दूसरे, कंकड़ का बिछाना हादसा कैसे हुआ ? यदि कंकड़ के राह पर बिछा देने से कोई हादसा हो जाता है तो उसका राबिता तो हो !  

मकाँ तब्दील हो जाता है घर में
डिनर पर, या सवेरे नाश्ते पर.. ......... यह आजके दौर का बड़ा शेर हुआ है.

बिठाए आपको पलकों पे दुनिया
बहुत खुश हैं हम अपने बोरिये पर...... इस शेर की तासीर बहुत अच्छी लगी है.

हज़ारों जुगनुओं के बीच में भी
हमारा ध्यान है बुझते दिये पर............ बुझते दिये पर ध्यान होना एक अलग ही ऊँचाई दे रहा है.

ज़ुबाँ सिल ले, जिसे है जान प्यारी
कटेंगे सर यहाँ, सच बोलने पर............. ऐसा शेर कहना कोई विवशता है क्या ?

बाकी शेर भी मुझे ठीक-ठाक लगे हैं. या, भर्ती के ! प्रयासरत रहें. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 21, 2016 at 11:22am

आ. जयनित भाई , अच्छी गज़ल कही आपने , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 20, 2016 at 10:12pm
मकाँ तब्दील हो जाता गई घर में...
वाह वाह क्या ख़ूबसूरत शेर
बहुत अच्छा कह रहो जयनित जी
बधाइयाँ
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 20, 2016 at 10:07pm

बिछाया जिसने कंकड़ रास्ते पर..एक कंकड़ कैसे बिछाया जा सकता है ?
वो क्यों चुपचाप है इस हादिसे पर..किस हादिसे पर... खुलासा नदारद है 
बाकी खूब है ..बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2016 at 3:07pm
वाह ! बहुत खूब | सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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