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रूक जा ओ कामिनी

रूक जा ओ कामिनी , मृदुला सयानी
हम है पियासे राधे , पिला दे पानी ।

चाँदनी गमकत प्रिय , तोहर नव देह
निवेदन मोरा मानू , जोरू सिनेह ।

सुनु हे माधव प्रिय , आजु एक बात
मोन में राखह सखा ,मोन केर बात ।

हम धनि सुबधि , चेतन परनारी
प्रेम भरल बतिया , लागे मोरा गारी ।

तोहे सद्पुरूष , वचन दीजे मोरे
मान मोरा राखह , शपथ सिनेहे ।

हे गुणवंती राधे , चलू यमुना किनारे
तोहर नाम बंसी , लय लय पूकारे ।

गजमोती माँग तोहर , यही एक सपना
शंख कर चूड़ी देखू , तुम ही सुख साधना ।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by pratibha pande on January 26, 2016 at 12:49pm

मन मुग्ध करती  रचना ,अलग ही कुछ अंदाज़ में ,बधाई आदरणीया 

Comment by Samar kabeer on January 24, 2016 at 6:02pm
मोहतरमा कांता रॉय जी आदाब,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें |
Comment by kanta roy on January 23, 2016 at 10:56pm
मेरी यह रचना , १२ वीं - १३ वीं शताब्दी के महान कवि मैथिल कोकिल विद्यापति के गीतों से प्रेरित है ।
उन्होंने संस्कृत , अवहट्ठ और मैथिली में उत्कृष्ट रचना की है । उनके गीतों के सुर - तान भंगिमा उनके स्वंय के ही रहते थे ,जिसकी सरलता के कारण ही उनके गीत सहृदय जनों के हृदय के हार बन गये ।
मैने उन्हीं के तान यानि भाष अर्थात राग पर इस गीत की रचना की है । प्रस्तुत गीत में मैने हिन्दी और मैथिली शब्दों के संयोजन कर एकरसता में बाँधने का प्रयास किया है ।
गमकत = महकत
नव देह = किशोरी
चेतन = सयानी / होशियार
बतिया = बातें
गारी = गाली
सिनेहे =स्नेह
लय लय = लेते लेते
तोहर = तुम्हारा
शंख अर्थात सुहागनों द्वारा पहनी जाने वाली शंख की चूड़ियाँ
कर = हाथ ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 23, 2016 at 7:28pm

आ० कांता जी  आपकी इस भाव पूर्ण रचना में बँगला टच है  (यदि मैं गलत नहीं हूँ ) जो इसे कर्ण प्रिय बनता है 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 23, 2016 at 6:12pm

हार्दिक बधाई आदरणीय कांता जी !आपकी यह कविता मैंने कई बार पढी मगर इसमें प्रयुक्त भाषा और  शब्दों की क्लिष्टता के कारण पूर्ण रूप से समझ नहीं पाया!क्षमा चाहता हूं!सादर!

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