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गंगा जमुनी परंपरा को

मानव मन में झंकृत कर दो

वेद रिचाएँ महक उठे सब

मंत्रों को उच्चारित कर दो

हे! भारत जागो

 

गुंफित हो वन उपवन सारे

अवनी को शुभ अवसर दे दो

रुके पलायन गाँव गली का

हृदय में समरसता भर दो

हे! भारत जागो

 

बलिदानों के प्रतिबिम्बन में

रिश्ते फूलें खुले गगन में

छुपी हुई मंथर ज्वाला को

मानवता में मुखरित कर दो

हे! भारत जागो

 

रूप तरुण तेरा मन भावन

स्वतंत्र विहार मिला है पावन

हिंदुस्तान न्योछावर तुम पर

तरुणाई को प्रसरित कर दो

हे! भारत जागो

 

स्वाभिमान से जगे भोर में  

डग-मग ना हो तिमिर घोर में

प्राण गवां कर शान बचाएँ

ऐसा प्रण तन मन में भर दो 

हे! भारत जागो

 

आँधी पश्चिम की जो आए

ज्ञान पवन चढ़ वापिस जाए

हर बच्चा केशव बन जाए

कर्म निरत हर जीवन कर दो

हे! भारत जागो

कल्पना मनोरम 

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 310

Comment

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Comment by kalpna mishra bajpai on January 20, 2016 at 9:49pm

आदरणीय Samar kabeer जी आपका आभार /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on January 20, 2016 at 9:48pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका आभार /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on January 20, 2016 at 9:46pm

अदरणीय कांता जी आपका बहुत आभार /सादर 

Comment by kanta roy on December 22, 2015 at 12:32pm


स्वाभिमान से जगे भोर में
डग-मग ना हो तिमिर घोर में
प्राण गवां कर शान बचाएँ
ऐसा प्रण तन मन में भर दो
हे! भारत जागो-------वाह !!! अप्रतिम सौंदर्य लिए मन में नई ऊर्जा का संचार भरती अति सुन्दर रचना ,बधाई स्वीकार करें आदरणीया कल्पना जी।

Comment by Shyam Narain Verma on December 21, 2015 at 3:04pm
इस खूबसूरत रचना के लिये दिली दाद कुबूल करें
Comment by Samar kabeer on December 18, 2015 at 10:53pm
मोहतरमा कल्पना जी,आदाब,इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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