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आखिरी स्टेशन का मुसाफिर / कान्ता राॅय

जिंदगी रेल सी
दौडती हुई
भागती हुई
स्टेशन दर स्टेशन
सरक कर रूकती हुई
चढते मुसाफिर
उतरते मुसाफिर
रेलम की पेल में
यादों का कारवां
सीट के नीचे दबकर
रह जाता है
ट्रेन में बैठा
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर
सब देखता हुआ
कुछ सोचता हुआ
बैठा रहता है अकेले

साथ बैठ कर
मुँगफली खाते हुए
चाय के सकोरे के संग
बनाए हुए कुछ रिश्ते ,कुछ संवाद और समस्त संवेदनाओं को
अपने बैग में कस कर
कंधे पर डाल
बीच स्टेशन का मुसाफिर
उतर जाता है
ले जाता है डब्बे की
कुछ दास्तान अपने संग
बदले में सीट के नीचे
बहुत कुछ अपना छोड़ जाता है
देखता रहता है
सोचता रहता है
बैठा रहता है अकेले
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर

आखिरी स्टेशन आने से पहले
एक सन्नाटा सा
ट्रेन की बोगी में
भर जाता है
यादों के काफिले के संग
गाड़ी सरक कर
आखिरी स्टेशन पर
पहुँच जाती है
प्रतीक्षा करते हुए
बेसब्री से
अपने लोगों को
देखते ही वह ट्रेन के
आखिरी स्टेशन का मुसाफिर
रम जाता है
चहकते हुए महकते हुए
अपने लोगों में स्वंय को
दुरूस्त पाता है
गंतव्य पर आते ही
मुसाफ़िरों की यादों को वह भी
उसी सीट के नीचे छोड़ आता है
उन यादों को वह भी
उसी सीट के नीचे छोड़ आता है


मौलिक और अप्रकाशित

Views: 565

Comment

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Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:17am
रचना पसंदगी के लिए आभार आपको आदरणीय जवाहर जी ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:11am
कविता पढकर आपको स्वंय द्वारा उस आखिरी स्टेशन का मुसाफिर के एहसास होने ने मेरी इस रचनाकर्म की सार्थकता को मानो साकार कर दिया । हृदयतल से आभार आपको आदरणीया राहिला आसिफ़ जी ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:09am
रचना के मर्म को समझने के लिए तहेदिल आभार आपको आदरणीय जयप्रकाश जी ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:07am
कविता में सहयात्रियों के भाव ही मन में समाये रहे ,इसलिए रचना जीवन दर्शन से ना जोड़ पाई मै । मै अपनी अगली रचना में जरूर कोशिश करूँगी कुछ बहुआयामी लिखने की । मार्गदर्शन युक्त सार्थक प्रतिक्रिया हेतु आभार आपको आदरणीय डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी ।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 7:03am
आभार कल्पना जी रचना पसंदगी के लिए ।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 21, 2015 at 4:20pm

अभी अभी मैं लम्बी ट्रेन की यात्रा कर लौटा हूँ ...बिलकुल ऐसा ही कुछ महसूस करता हुआ. सादर!

Comment by Rahila on October 21, 2015 at 4:11pm
बहुत सुन्दर कविता आदरणीया कांता दी! कुछ देर के लिये मुझे आखरी स्टेशन का मुसाफ़िर का सा आभास हो उठा । बहुत बधाई आपको ।
Comment by Jayprakash Mishra on October 18, 2015 at 8:38pm
आखिरी स्टेशन आने से पहलेएक सन्नाटा साट्रेन की बोगी मेंभर जाता हैयादों के काफिले के संगगाड़ी सरक करआखिरी स्टेशन परपहुँच जाती ह
Man ki komal bhawanaon ko shabdon me pirone ke liye badhaai adarniya Kanta ji
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 18, 2015 at 7:46pm

कविता  जीवन यात्रा को संदर्भित करती तो और अच्छा   होता   मैं  अंत तक इसी आशा में पढता रहा किन्तुं  अंत में कुछ श्रम शेष रह गया .

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