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ये कैसा कन्या पूजन

एक हाथ से कन्या पूजन दूजे हाथ से कन्या हनन
माँ को खुश करने का कैसा है ये आयोजन
धन वैभव की चाहत में सुख संपत्ति के आगत में
मनाते सभी त्यौहार लक्ष्मी जी के स्वागत में
पर ये कैसा अनर्थ जो गृहलक्ष्मी पर भारी
घर अस्पताल में चलती इस लक्ष्मी पर आरी
माँ की ममता बेबस और निष्ठुर पिता का साया
उस घर में बेटी का जन्म क्यूँ न किसी को भाया
कैसी स्वार्थी कैसी निर्दयी ये दुनिया की मंडी
जहाँ बेबस है शक्ति स्वरूपा दुर्गा काली और चंडी
जिन हाथों से डाली जाती है यज्ञ में आहुतियाँ
उन हाथों में रक्त पिपासु है कैसी आकृतियाँ
बेटी हूँ मैं कोई पाप नहीं सकल सृष्टि की वाहक हूँ
रिश्तों को महकाती हूँ और संस्कृति की संवाहक हूँ.

- डॉ हृदेश चौधरी
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Shyam Narain Verma on October 16, 2015 at 11:58am
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

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