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लघुकथा – संतान हीन

"चाचीजी, मेरे मन में वर्षों से एक सवाल  है, यदि आप बुरा ना मानो तो पूछ लूं"!

"बिरज़ू बेटा,  पूछ ले क्या शंका है तेरे मन में"!

"चाचीजी, पूरे खानदान में आपकी और चाचाजी की जोडी सबसे अब्बल है! सुंदर ,स्वस्थ और आकर्षक, मगर संतान हीन!क्या आपने कभी इस बारे में नहीं सोचा!कोई जांच आदि नहीं कराई"!

"क्या करेगा अब ये गढे मुर्दे उखाडकर, जाने भी दे"!

"चाचीजी, बताइये ना, ऐसा क्यों हुआ"!

"तो सुन,  जब मैं  व्याह के आयी थी तो पहले ही दिन मुझे  घर की औरतों ने  बताया कि तेरे चाचाजी का मुहल्ले की किसी लडकी उमा से प्यार है!सुहाग रात में मेरा तेरे चाचा से यही पहला सवाल था! तेरे चाचा ने भी ईमानदारी से यह बात क़बूल कर ली!बस मैंने फ़ैसला सुना दिया कि मुझे पत्नी का सम्मान देना है तो उस रिश्ते को खत्म करो!तेरे चाचाजी से  वो रिश्ता खत्म  ना किया गया! और मैं भी अपनी ज़िद पर अडी रही! बस ऐसे ही हम चालीस साल से नदी के दो किनारों की तरह जीते रहे, जो कभी भी नहीं मिलते"!

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(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 14, 2015 at 9:10am

हार्दिक आभार सुशील जी!

Comment by Sushil Sarna on October 13, 2015 at 8:58pm

आदरणीय तज़वीर सिंह जी पति पत्नी के गूढ़ संबंधों पर चोट करती सुंदर लघु कथा बनी है। हार्दिक बधाई सर। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 13, 2015 at 7:15pm

हार्दिक आभार शेख उस्मानी जी!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 5:54pm
बहुत कड़वा सत्य जो कि पति-पत्नियों को एक सबक़ देता है। बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय Tej Veer Singh जी।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 13, 2015 at 4:32pm

हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी!

Comment by Shyam Narain Verma on October 13, 2015 at 3:47pm
इस अच्छी लघु कथा के लिए बधाई, आदरणीय

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