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क्यों होता है अकेलापन
क्यों खो जाता है बचपन.
क्यों हो जाते है हम बड़े
कहाँ चल जाता है छुटपन.
क्यों नहीं आती नींद,
क्यों अपने जाते बिंध
क्यों पराया बनता मित्र
क्यों होते स्वयं में लिप्त.
क्यों तिरोहित हो जाता
जीवन का सुखद संगीत.
क्यों छूट जाता अतीत.
क्यों उदासीन होता मन
जबकि साथ है तन- धन .
क्यों बढ़ जाता मोह
जीवन का यह उहापोह.

.
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित.

Views: 430

Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on December 18, 2014 at 8:01am

आदरणीय शिज़ज़ु शकूर भाई जी,
रचना पर आपकी सराहना पाकर धन्य हुआ.बहुत आभार,सादर.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on December 18, 2014 at 7:59am

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी,
रचना पर आपकी सराहना पाकर धन्य हुआ.बहुत आभार,सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 17, 2014 at 11:09pm

क्यों उदासीन होता मन 
जबकि साथ है तन- धन .
क्यों बढ़ जाता मोह 
जीवन का यह उहापोह

बहुत अच्छी रचना है बधाई आपको आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2014 at 7:57pm

बहुत अच्छी रचना है बधाई आपको

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on December 17, 2014 at 9:12am

आदरणीय गोपाल नारायण जी,सोमेश कुमार जी,हरी प्रकाश जी,
आप सबों ने रचना के प्रश्नों का संज्ञान लिया,मेरा रचनाधर्म सार्थक हुआ .आप सबों का बहुत- बहुत आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2014 at 8:50am

i विजय जी

प्रश्न आपने उठाये i उत्तर हमें तलाशने है i कोशिश करता  हूँ i सादर

Comment by somesh kumar on December 16, 2014 at 10:51pm

जीवन की इस उहापोह में उलझे हम सभी पथिक अपनी यात्रा पर चलायमान हैं ,बहुत से प्रश्नों के जवाब कभी नहीं मिलेगें ,यात्रा यथावत रहेगी ,यात्री तब्दील हो जाएँगे 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 16, 2014 at 10:32pm

क्यों बढ़ जाता मोह 
जीवन का यह उहापोह...सुन्दर रचना आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी ,हार्दिक बधाई !

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