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(1)

रे दुराचारी
देख ना आयी शर्म
अबला नारी


(2)

बन सबला
कर नाश दुष्टों का
नारी अबला


(3)

नन्ही सी जान
खिलखिला देती थी
आज बेजान


(4)

मन को भाया
घने धूप में पंथी
वृक्ष की छाया


(5)

सांस की जान
काट रहे नादान
होते बेजान

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 640

Comment

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Comment by Pawan Kumar on October 6, 2014 at 6:13pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी सादर अभिवादन
इस प्रयास को बल देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2014 at 9:33pm

आदरणीय पवन भाई , बढ़िया हाइकु रचना हुई है , दिली बधाइयां |

Comment by Pawan Kumar on October 1, 2014 at 11:07am

आदरणीय जितेन्द्र भईया सादर अभिवादन, प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 30, 2014 at 10:07pm

अति सुंदर. बधाई  पवन भाई

Comment by Pawan Kumar on September 30, 2014 at 6:44pm

आदरणीय हरिवल्लभ शर्मा जी सादर अभिवादन, रचना की प्रशंसा व उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद!

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 12:34pm

बहुत सारगर्भित सटीक हाइकू ..उत्तम रचनाओं हेतु बधाई आपको मित्र Pawan Kumar जी ..

Comment by Pawan Kumar on September 30, 2014 at 10:35am
आदरणीय रमेश कुमार चैहान जी सादर अभिवादन, प्रयास को स्वीकारने व उत्साहवर्धन हेतु हृदय से धन्यवाद!
Comment by Pawan Kumar on September 30, 2014 at 10:31am
आदरणीय डा0 विजय शंकर जी सादर अभिवादन, रचना की सराहना के लिए हृदय से आभार!
Comment by रमेश कुमार चौहान on September 29, 2014 at 8:22pm

इय प्रयास के लिये बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 29, 2014 at 8:14pm

आदरणीय पवन कुमार  जी ,हाइकु  , सराहनीय प्रयास , स्नेह  बधाई।     

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