माँ की छोटी कोख में, पूत रहा नौ माह,
माँ को आश्रम भेज कर, मिली पूत को राह |
मिली पूत को राह, नहीं माँ वहां अकेली |
घरको से थी दूर, बहुत पर मिली सहेली
कह लक्ष्मण कविराय, पूत करले चालाकी
उसका ही सम्मान, करे जो पूजा माँ की |
(२)
परछाई भी दिख रही, अपने बहुत करीब
हाथ बढ़ा कर छू सकूँ, ऐसा नहीं नसीब |
ऐसा नहीं नसीब, भ्रमित मन होता इतना
स्वप्न मात्र संयोग, मिले नसीब में जितना
कह लक्ष्मण कविराय, स्वप्न में फटी बिवाई
उसे डराती देख, स्वयं उसकी परछाई ||
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
कुंडलिया छंद पसंद आई आपको, हार्दिक आभार आपका श्री गिरिराज भंडारी जी
छंद पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी |
कुंडलियाँ छंद पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री अरुण शर्मा "अनंत" जी |"घरको से थी दूर, बहुत पर मिली सहेली"
इसको यूँ संशोधित किया जाना प्रस्तावित है भाई श्री अनंत जी -
दूर हुआ परिवार, मिली पर वहां सहेली
हार्दिक आभार आपका श्री जितेन्द्र "गीत"भाई
आदरनीय लक्ष्मण भाई , बहुत बढ़िया कुंडलिया रचना की है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ! आदरणीय अरुण भाई जी से सहमत हूँ ,
घरको से दूर ?
करे जो पूजा माँ की |
आदरणीय श्री लड़ीवाला जी
सत्य . अनुपालन योग्य
सादर बधाई .
आदरणीय सर दोनों ही कुण्डलिया छंद बहुत ही शानदार बन पड़े हैं सुन्दर सटीक कुण्डलिया छंद पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.
प्रथम कुण्डलिया छंद में "घरको से थी दूर" स्पष्ट नहीं लगा आप भी देख लें.
बहुत सुंदर कुंडलियाँ रची आपने आदरणीय लक्ष्मण जी, हार्दिक बधाई आपको
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