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1

गिरते – गिराते

उठा-पटक 

शातिर चालें

शह और मात

जूतम पैजार

चमकाते हथियार

भड़काते विचार  

हो जाइए तैयार

फिर गरम है

चुनावी बाज़ार ।

 

2

 

चापलूसों की फौज

शहीदों का अपमान

गिरती इंसानियत

बेचते ईमान   

लड़ते –लड़ाते

शोर मचाते

लक्ष्य है जीत।

 

3

झूठ पे झूठ

आरोप प्रत्यारोप

काम का दिखावा

बातों से लुभाना

लो खुल गया

चुनावी पिटारा ।

 

4

बंटता समाज

धर्म और जाति में टूटते लोग

कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं

छोटे बड़े ठेकेदार

चुनिये द बेस्ट

पड़ा है कचड़े का ढेर।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2014 at 1:46am

सामान्य कथ्य और सहज बोलचाल की भाषा में राजनीति के जिस घिनौने पक्ष को बखूबी आपने उभारा है, उसके लिए साधुवाद. हार्दिक बधाई स्वीकार करें,  नादिर भाई

Comment by नादिर ख़ान on April 17, 2014 at 11:35pm

आदरणीय विजय मिश्र जी आपने कोशिश को सराहा लिखना सार्थक हुआ बहुत आभार...

Comment by विजय मिश्र on April 14, 2014 at 4:06pm
नादिर भाई ! बाखूबी और बेतकल्लुफ अन्दाज में कम लफ्जों के सहारे मगर उधेड़कर रख दियी है आपने इस गंदे खेल को |साल दर साल बहोत घिनौना शक्ल अख्तियार करता जा रहा है ये सियासी खेल |मेहरबानी |
Comment by नादिर ख़ान on April 12, 2014 at 12:34pm

आदरणीय जितेंद्र जी आदरणीया अन्नपूर्णा जी एवं आदरणीय गिरिराज जी उत्साह वर्धन के लिए बहुत आभार...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 11, 2014 at 6:20pm

आदरणीय नादिर खान भाई , वर्तमान चुनाव की कड़वी सच्चाइयाँ बयान करती आपकी रचना के लिये बधाइयाँ !!

Comment by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 1:57pm

बहुत खूब । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 9, 2014 at 9:59pm

झूठ पे झूठ

आरोप प्रत्यारोप

काम का दिखावा

बातों से लुभाना

लो खुल गया

चुनावी पिटारा ।..................यह तो खास गुण है नेताओं का चुनावी उत्सव में

बहुत बढ़िया रचना आदरणीय नादिर साहब , हार्दिक बधाई आपको

 

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