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नादिर ख़ान's Blog (63)

झूम के देखो सावन आया ....

खुशियों की सौगातें लाया

झूम के देखो सावन आया

 

चंचल सोख़ हवा इतराई

बारिश की बौछारें लाई

महक उठा अब मन का आँगन

भीनी भीनी सी खुशबू छाई

 

देख छटा हर मन हर्षाया

झूम के देखो सावन आया ...

 

 

मन की बगिया महक रही है

पंछी बन के चहक रही है

इच्छाओं को पंख मिल गए

दिल की धड़कन बहक रही है

 

मौसम में है खुमार छाया

झूम के देखो सावन आया ...

 

धरती बाहों को…

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Added by नादिर ख़ान on August 14, 2018 at 11:21pm — 6 Comments

सहे ज़ुल्म हमने सदा हँसते हँसते

      (122  122  122  122)

कोई बात दिल में छुपाते नहीं हैं

मगर आँसुओं को दिखाते नहीं हैं

 

सहे ज़ुल्म हमने सदा हँसते हँसते

मिले ज़ख्म कितने गिनाते नहीं हैं

 

ये बातें हैं दिल की सुनो तुम भी…

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Added by नादिर ख़ान on February 18, 2018 at 8:00pm — 6 Comments

डुबो देगी हमें ये बेईमानी

(1222 1222 122)

जिन्हें आने की फुरसत ही नहीं है

उन्हे मिलने की हसरत ही नहीं है

 

अगर तुझमें शराफत ही नहीं है

मुझे तेरी ज़रूरत ही नहीं है

 

डुबो देगी हमें ये बेईमानी

ये इंसानों की फ़ितरत ही नहीं है

 

उगलते हैं ज़ुबाँ से आग अपनी

बची इनमें शराफत ही नहीं है

 

चलो छोड़ो जुदा थी राह अपनी

हमें तुमसे शिकायत ही नहीं है

 

असल मुद्दों से ही भटकाये रखना

सियासत की रिवायत ही नहीं…

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Added by नादिर ख़ान on February 4, 2018 at 6:31pm — 10 Comments

हाइकू

1

इंसानी भूल

लापरवाह लोग

धूल ही धूल

2

प्यारी सी धुन

सुबह का मौसम

प्यार से सुन 

3…

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Added by नादिर ख़ान on December 29, 2017 at 10:30pm — 4 Comments

क्षणिकाएँ

1.

शायद आज बच जाओ

साम दाम दण्ड भेद से

मगर एक कैमरा

नज़र रखे है

हर करतूत पर

बिना साम दाम दण्ड भेद के .....

 

2.

मत उलझाइये खेल

मत कीजिये घाल-मेल

सीधी है ... सीधी ही रहने दीजिये

जिंदगी की रेल

 

3.

उठ रहे हैं बच्चे

सूरज के जागने से पहले

ठिठुर रहे हैं बच्चे

पीठ में बोझ लिए

झेल रह हैं बच्चे

भविष्य का दण्ड…

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Added by नादिर ख़ान on December 25, 2017 at 1:30pm — 10 Comments

बीमार?

उसे होश में आया देख डॉक्टर का नुमाइंदा पास आया और फरमान सुनाने लगा । अपने घर बात करके  15 हज़ार रुपये काउंटर में जमा करवा दो बाकि के पैसे डिस्चार्ज के समय जमा करा देना । मगर साहब मै बीमार नहीं, बस दो दिन से भूखा हूँ। उसकी आवाज़ घुट के रह गई, नुमाइंदा जा चुका था ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by नादिर ख़ान on December 9, 2017 at 10:00pm — 12 Comments

क्षणिकाएँ

     

1. 

उतारिए चश्मा

पोछिये धूल

चीज़ें खुदबखुद... साफ़ हो जाएँगी ।

 

 

2.

ज़रूरी है… सफाई अभियान

शुरुआत कीजिये

दिल से ....

 

3.

गंदगी सिर्फ मुझमे ही नहीं

तुम में भी है मित्र

ज़रा अंदर तो झाँको ....

 

4.

जब ईमान गिरवी हो

ज़मीर बिक चुका हो

कौन उठायेगा बीड़ा

समाज की सफाई का ....

 

5.

साफ़ नहीं होती गंदगी

बार बार उंगली दिखाने…

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Added by नादिर ख़ान on November 26, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल

(22 22 22 22)

क्यूँ है तू बीमार मेरे दिल

गम से यूँ मत हार मेरे दिल

 

तय है इक दिन मौत का आना

इस सच को स्वीकार मेरे दिल

 

पहले ही से दर्द बहुत हैं

और न ले अब भार मेरे दिल

 

सुनकर भाषण होश न खोना

ये सब है व्यापार मेरे दिल

 

कौन यहाँ पर कब बिक जाए

रहना तू हुशियार मेरे दिल

 

झूठ खड़ा है सीना ताने

सच तो है लाचार मेरे दिल

 

दिल के कोने में रहने दे

प्यार…

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Added by नादिर ख़ान on November 2, 2017 at 12:30am — 8 Comments

कितना सुकून है तेरी यादों की छाँव में

2212 1212 2212 12

कितना सुकून है तेरी यादों की छाँव  में

लगता है जैसे बैठे हैं जन्नत की ठाँव में

 

फिरते हैं अब तलाश में जिसकी यहाँ वहाँ

मिलता था वो सुकूँ कभी पीपल की छाँव  में

 

आँखों को इंतिज़ार है आने का आपके

मुड़कर तो आइये ज़रा अपने ही गाँव में

 

कुछ इस्तेमाल कीजिये अपना दिमाग भी   

किसको मिला है फायदा नफरत के दाँव में

 

अब क्या सुबूत दें तुम्हें जद्दोजहद की हम

छाले पड़े हैं आज तक हम सब…

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Added by नादिर ख़ान on May 15, 2017 at 12:00am — 11 Comments

कर्ज़ का बोझ

वह किसान था

लड़ता रहा उम्र भर

कभी सूखे की मार से  

तो कभी बाढ़ की तबाही से

कभी बेमौसम बारिश से

तो कभी ओला वृष्टि से .....

 

वह किसान था  

सहता रहा उम्र भर

हर तक़लीफ

हर गम

ताकि भरा रहे पेट दूसरों का  .....

 

वह किसान था  

करता रहा गुज़ारा

बचे खुचे पर

वह सीख गया था, एडजस्ट करना

प्रक्रति के साथ......

 

वह किसान था  

खुश रहता था  

हर परिस्थिति…

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Added by नादिर ख़ान on August 11, 2016 at 11:00am — 5 Comments

तरही ग़ज़ल

जब कदम बढ़ गए सरकशी की तरफ

आदमी चल पड़ा  गुमरही की तरफ

 

मुतमइन हैं सभी अब अंधेरों में भी

देखता कौन है रोशनी की तरफ 

 

पागलों की तरह भागते हम रहे

हमने देखा नही ज़िंदगी की तरफ

 

दुश्मनी कर चुके आप सबसे बहुत

कुछ कदम तो चलें दोस्ती की तरफ

 

सबने देखी मेरी मुस्कुराहट मगर

किसने देखा मेरी बेबसी की तरफ

 

बोझ गम का लिए क्यूँ खड़े हो मियां

इक पहल तो करो तुम खुशी की तरफ

 

आस…

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Added by नादिर ख़ान on August 3, 2016 at 11:00am — 7 Comments

हमने खुद को ही शर्मसार किया

 ( 2122  1212  22/112 )

मैंने उसपर ही ऐतबार किया

बारहा जिसने मुझपे वार किया

मैं समझता रहा उसे अपना

उसने जड़ पर ही मेरे वार किया 

तुमने अपने लिये तो फूल चुने

मेरे हिस्से में सिर्फ खार किया 

फिर खुशी लौट कर नहीं आयी

हमने बस तेरा  इन्तिज़ार किया

वो जो बुनियाद थी भरोसे की

शक ने रिश्ता वो तार तार किया

लौ खुदा से अभी लगाई थी

किसकी यादों ने बेकरार किया 

गर…

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Added by नादिर ख़ान on May 4, 2016 at 1:07pm — 18 Comments

कुछ कहो तो सही रोकता कौन है

    २१२ २१२ २१२ २१२

है सही या गलत, सोचता कौन है । 

सच को सच आजकल बोलता कौन है ।

 

यूँ तो सब ही बराबर के हक़दार हैं

इक तराज़ू में पर तोलता कौन है ।

 

अब भी पानी की इक बूँद की आस में

रातभर चाँद को ताकता कौन है ।

 

माँ को गुज़रे हुए सालभर हो गए

हर बुराई से फिर रोकता कौन है ।

 

इक मुलाकात थी और कुछ भी न था

करवटें ले के फिर, जागता कौन हैं ।

बोझ गम का लिये आ गये जब यहाँ

कुछ कहो तो…

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Added by नादिर ख़ान on February 23, 2016 at 4:00pm — 4 Comments

पिता

वो छुपाते रहे अपना दर्द

अपनी परेशानियाँ

यहाँ तक कि

अपनी बीमारी भी….

 

वो सोखते रहे परिवार का दर्द

कभी रिसने नहीं दिया

वो सुनते रहे हमारी शिकायतें

अपनी सफाई दिये बिना ….

 

वो समेटते रहे

बिखरे हुये पन्ने

हम सबकी ज़िंदगी के …..

 

हम सब बढ़ते रहे

उनका एहसान माने बिना

उन पर एहसान जताते हुये

वो चुपचाप जीते रहे

क्योंकि वो पेड़…

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Added by नादिर ख़ान on February 3, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

संकल्प (लघुकथा)

अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by नादिर ख़ान on December 2, 2015 at 10:45pm — 16 Comments

जुबाँ से इस कदर कड़वा तू हरदम बोलता क्यूँ है...

1222  1222  1222  1222

बुराई का बुराई से जहाँ में सामना क्यूँ है

कि इतनी ज़ुल्म की बढ़ती हुयी अब इन्तेहा क्यूँ है...१

 

 हमारी राह में तुमने, तुम्हारी राह में हमने

जो बोये थे वही कटेंगे इतना सोचता क्यूँ है ....२

 

कभी मेरी भी बातें सुन कभी मुझसे भी आकर मिल

तेरी परछाई हूँ मुझसे तू इतना भागता क्यूँ है ..३

  

ज़रा सा देख ले तू इक नज़र मेरे भी बच्चों को

तेरे बच्चों के जैसे हैं, तू इनसे रूठता क्यूँ है…

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Added by नादिर ख़ान on December 1, 2015 at 6:00pm — 13 Comments

राह में सबके लिए फूल सजाकर देखो

२१२२  ११२२  ११२२  २२

 

अपनी खुशियों पे नया रंग चढ़ाकर देखो

बंद पिंजरे के ये पंछी तो उड़ाकर देखो

 

मेरी आँखों से बहा जाता है आँसू बनकर

अपनी यादों में कभी खुद को जलाकर देखो

 

बात बन जायेगी बिगड़ी है जो सदियों से यहाँ

तुम ज़रा अपनी अना को तो झुकाकर देखो

 

सिर्फ बातों के सहारे न हवा में उड़ना

तुम हकीकत नज़र आज  मिलाकर देखो

 

तुमको हर नेकी के बदले में मिलेगी खुशियाँ

राह में सबके…

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Added by नादिर ख़ान on November 24, 2015 at 6:30pm — 12 Comments

अपराध बोध (लघुकथा )

भरी दोपहरी मई के महीने में वो दरवाज़े पर आया और ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगाने लगा खान साहब…….. खान साहब……..| मेरी आँख खुली मैंने बालकनी से झाँका | एक ५५-६० साल का अधबूढ़ा शख्स, पुराने कपड़ों, बिखरे बाल और खिचड़ी दाढ़ी में सायकल लिए खड़ा है। मुझे देखते ही चिल्ला पड़ा फलाँ साहब का घर यही है| मैंने धीरे से हाँ कहा और गर्दन को हल्की सी जेहमत दी | वो चहक उठा उन्हें बुला दीजिये | मैंने कहा अब्बा सो रहे हैं, आप मुझे बताएं | उसने ज़ोर देकर कहा, नहीं आप उन्हें ही बुला दीजिये , कहियेगा फलाँ शख्स आया है। मुझे बड़ा…

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Added by नादिर ख़ान on October 28, 2015 at 12:30pm — 7 Comments

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

2122 1122 1122 22

अपनी आँखों से ये मंज़र नहीं देखे जाते

हाथ में अपनों के खंजर नहीं देखे जाते

दुश्मनी की भी कोई हद तो मुक़र्रर कर दो

इन गरीबों के जले घर नहीं देखे जाते

बातों ही बातों में शमशीर निकल जाती है

हमसे बच्चों के ये तेवर नहीं देखे जाते

खूबसूरत हैं बहुत आपकी प्यारी आँखें

गम के है इनमें जो सागर नहीं देखे जाते

याद गावों की मुझे अब भी सताती है बहुत

अपने पुरखों के ये खण्डर…

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Added by नादिर ख़ान on September 30, 2015 at 11:00am — 4 Comments

तरही गज़ल (रात को रो-रो सुबह किया या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया)

है काम बहुत कुछ करने को, यूँ हमने कब आराम किया

दिन न देखा रात न देखी बस जीवन भर काम किया

 

मज़दूर हूँ मै, मजबूर हूँ मै, हर हाल में मैंने काम किया 

फिर भी सबने मेरे आगे, दर्द का कड़वा जाम किया

रब से तुझको हरदम माँगा दिल भी तेरे नाम किया

फिर भी तूने मेरे हक में बस झूठा इल्ज़ाम…

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Added by नादिर ख़ान on July 26, 2015 at 4:30pm — 7 Comments

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