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चेतनाहीन

 

मैं

एक सपेरा हूँ , मदारी हूँ

कश्मीर से कन्या कुमारी , और –

गुजरात से अरुणाचल तक

दिल्ली

मेरी पिटारी है ।

बंद हैं इसमे काले विषधर साँप , बंदर

पर अफसोस –

ये गाँधीवादी नहीं

इनके आँख , कान और मुंह

सभी बंद हैं

क्यूँ कि ये अवसरवादी हैं ।

मैं गाँधी

एक सपेरा , मदारी !

खड़ा बजा रहा हूँ बीन

पर , अफसोस –

ये चेतनाहीन हो गए से लगते हैं ।

------- मौलिक एवं अप्रकाशित -------

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Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 1:21pm

आदरणीय ब्रह्मचारी भाई , वर्तमान पर बहुत लाजवाब रचना हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 12:53pm

वाह भाई साहब क्या मदारी का मदारीपन दिखलाए है....अवसरवादी इनका पेशा है अन्यथा वह भूखा मर जाएगा.

Comment by Shyam Narain Verma on April 5, 2014 at 4:28pm
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई ................
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 5, 2014 at 11:07am

बहुत करारा व्यंग, पढ़कर मजा आ गया. हार्दिक बधाई आपको

Comment by कल्पना रामानी on April 4, 2014 at 10:17pm

कसी हुई भाषा शैली में आपकी यह व्यंग्य रचना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। हार्दिक बधाई आपको  

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