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तुमने मेरे मस्तिष्क को

बींदने की

बेपनाह कोशिश की है

उसे नियन्त्रित करने की

मशक्कत की है कि, जैसा तुम चाहो

मैं वैसा सोचूँ..

तुमने मुझे एक से बढ़ कर एक

रंगीन जाल दिखाया

बनाये अनोखे तिलिस्म और चाहा

कि जैसा तुम दिखाना चाहते हो

मैं बस वो ही देखूँ..

तुमने मेरी उंगलियों को

छेद छेद कर, पिरोने चाहे

रेश्मीं धागे, और चाहा

कि जो तुम चाहो

मैं बस वो ही लिखूँ..

मुझे मालूम है

तुम्हारा पूरा का पूरा निज़ाम

बस इस बल पर खडा है

कि जो तुम चाहते हो

मैं वही बोलूँ..

तुम मेरी वैधानिक हत्या के

तमाम अस्त्रों से लैस हो

मैं निहत्था हूँ

फ़िर भी बलवान

क्योंकि, तुम्हारा एक-एक औज़ार

तुम्हारी जेलें

यातनायें-धमकियां

और फ़ांसी के फ़ंदे

मुझे शिखंडी न बना सके.

मेरे एक छोटे से प्रश्न पर

न्याय और समता के प्रश्न पर

तुमने दिखा ही दिया

अपना वीभत्स रुप.

मेरे खून की एक एक बूंद

तेरा पर्दाफ़ाश करेगी.

मैं मजबूर हूँ

मैं वह नहीं सोच सकता जो तुम कहो

मैं वह नहीं देख सकता जो तुम दिखाओ

मैं वह नहीं लिख सकता जो तुम लिखवाओ

मैं वो नहीं कह सकता जिसे तुम चाहो

.==================================

रचनाकाल: दिसंबर २७,२०१०

Views: 547

Comment

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Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 11, 2011 at 6:47pm
Tilak Raj ji....Sadar Pranam....!!!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on February 11, 2011 at 5:25pm

आज तन्‍हा लड़ रहा हूँ, कल हज़ारों हाथ होंगे

युद्ध तुम कैसे लड़ोगे, जब वो मेरे साथ होंगे।

Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 8, 2011 at 8:19pm

Rakesh ji...aapka dhanyawad.

sadar

Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 8, 2011 at 7:02pm

Dr Nutan Sahiba, aapka bahut bahut aabhar...

Sadar

Comment by Dr Nutan on February 8, 2011 at 6:02pm

बहुत खूब  शम्स जी..

विद्रोह और ताकत से लबरेज कविता .. उम्दा ..

Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 5, 2011 at 6:04pm

Rana Pratap ji aur Abhinav ji....

aap dono ka main bahut bahut aabhar vyakt karta hun...Saath banaye rakhiyyega...

Sadar


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on February 5, 2011 at 10:18am

क्योंकि, तुम्हारा एक-एक औज़ार

तुम्हारी जेलें

यातनायें-धमकियां

और फ़ांसी के फ़ंदे

मुझे शिखंडी न बना सके.

 

शमशाद सर, इन शशक्त पंक्तियों के लिए साधुवाद|

Comment by Abhinav Arun on February 5, 2011 at 8:59am
वक्त की आवाज़ है ये कविता | चेतना के स्वरों से ओतप्रोत और निर्भीक | रचनाकार को सलाम करता हूँ |
Comment by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on February 4, 2011 at 7:31pm
Vandana ji, aapka shukriya..

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