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तेरी कुएँ सी प्यास

तेरी कुएँ सी प्यास
तेरी अघोरी भूख
भिखारन, तू नित्य मेरे आँगन में आती
एक धमकी
एक चुनौती
तेरे आशीष में होती
घबराकर मैं तेरी तृष्णा पालती.
तू मेरी धर्मभीरूता को खूब पहचानती
और, मेरी सहिष्णुता का गलत मतलब निकालती.

‘’दे अपना हाथ तुझे उबार दूँ.’’
तूने तड़प कर दुहाई दी
अपने कुनबे की.
भिखारन! तेरे कितने नाज़
तेरे कुकुरमुत्ते से उगते परिवार
गोंद से चिपके तेरे रीति रिवाज़

छोड़ अब माँगने की परम्परा.
काम कर, कुछ काम कर
चौका बासन कपड़े लत्ते धो
स्वाभिमान की रोटी पका
पर तू माने कब मेरी बात
मैं तुझे सहने पर मज़बूर.

रोज़ के उपदेशों से तंग आकर
एक दिन तूने कहा-
‘’माना कि नदी के होते दो किनार हैं
तू मालकिन मैं भिखारिन
तू दे कर माँगती
मैं माँगकर देती.’’ इतना कह
चल दी वह दूसरी गली मुस्काती
अपनी ही कथन से मात खाती
ठगी सी मैं रह गयी खड़ी.


(मौलिक व अप्रकाशित रचना)

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Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 18, 2014 at 12:01pm

घरेलू कामों से फ़ुरसत पाकर
आती हूँ आंगन में
बटोरती हूँ कल के लिये
जीवन के कुछ सामान
दूर बज उठती हैं 
पशुओं के गले की घंटी
टुन-टुन करती
खुरों की टापों में मिल जाती है
तुम्हारी परिचित आवाज़

बहुत सुन्दर रचना। सुन्दर चित्रण ग्राम्य जीवन प्रकृति और जिंदगी के प्रिय क्षण
भ्रमर

Comment by वेदिका on April 6, 2014 at 1:50pm
घबराकर मैं तेरी तृष्णा पालती.
तू मेरी धर्मभीरूता को खूब पहचानती
और, मेरी सहिष्णुता का गलत मतलब निकालती.

बहुत गहरे पैठ के खोजी गयी सीपि पंक्तियाँ , आपकी दार्शनिकता को नमन और आपके निष्कर्ष पर वारि वारि जाती हूँ।
अंनत शुभकामनाएं आदरणीया कुन्ती दीदी!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2014 at 8:43pm

रात के पल लेते हैं हमसे. बहुत कुछ लेते हैं ! ग़ोया ज़िद्दी भिखारिन रात के अनगिन बच्चे, ये पल..!  और हम लगातार देते चले जाते हैं. निरुपाय से.. प्रदाता बने !
इस मानसिक और शारीरिक छटपटाहट को अपनी भाषायी खूबसूरती से क्या ही आपने बाँधा है. आदरणीया !
आपकी यह कविता मुझे आपकी अबतक की सबसे अच्छी कविताओं में से लगी है. हर पहलू से समृद्ध और सार्थक. बारम्बार पठनीय.
सादर
 

Comment by Vindu Babu on February 2, 2014 at 5:00am

आदरणीया:

एक शोध दर्शाती हुई अच्छी रचना प्रस्तुत की है आपने। कोई भी काम इतना सहज नहीं होता,जितना दूर से दीखता है। लेन-देन पर तो संसार टिका है,कोई मूर्त रूप से देता है...तो कोई अमूर्त।

सादर शुभकामनायें...

Comment by vijay nikore on February 1, 2014 at 12:28pm

किसी को कुछ  दे कर हमारा अहं भी झट सामने आ जाता है, और हम उनसे और भगवान से अपेक्षा करते हैं।

इस दार्शनिक रचना के लिए बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 31, 2014 at 8:33pm

तू मालकिन मैं भिखारिन
तू दे कर माँगती
मैं माँगकर देती.’..........................बहुत गूढ़ दार्शनिक बात कही है आपकी इन पंक्तियों नें, जो सचमुच चिंतन को मजबूर करती है.

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by coontee mukerji on January 31, 2014 at 7:46pm

सभी मित्रों को हार्दिक आभार.....किसी को माँगने में सुख मिलता है तो किसीको देने में.......हम चाहे अपने अभिमान में लाख कह दें कि वह तो भीख माँगता है या माँगती है.......लेकिन क्या किसीसे कुछ माँगना आसान काम है..........?......बृजेश जी, आपकी सलाह मानकर मैंने इस रचना को पुनः संशोधन किया. बहुत सी बातों का फर्क मैं नहीं समझती थी. आपका मार्गदर्शन से मैं लाभांवित हुई. शुक्रिया.

Comment by ajay sharma on January 30, 2014 at 10:15pm

तेरी कुएँ सी प्यास
तेरी अघोरी भूख,,,,,,,,,,,speech less ....................

‘’माना कि नदी के होते दो ...............................तू मालकिन मैं भिखारिन
तू दे कर माँगती
मैं माँगकर देती.’’ इतना कह
चल दी वह दूसरी गली मुस्काती
अपनी ही कथन से मात खाती 
ठगी सी मैं रह गयी खड़ी.   ....................sashakt rachna ........pravahmayi prastuti . ....

Comment by Baidyanath Saarthi on January 30, 2014 at 9:56pm

बहुत ही समर्थवान लेखनी है आपकी ...पढ़कर अच्छा लगा आपको ! सादर नमन 

तेरे कुकुरमुत्ते से उगते परिवार
गोंद से चिपके तेरे रीति रिवाज़

छोड़ अब माँगने की परम्परा.....क्या कहने !

Comment by बृजेश नीरज on January 30, 2014 at 9:31pm

बहुत सुन्दर रचना! आपको हार्दिक बधाई!

इसे और कसा जा सकता है!

सादर!

कृपया ध्यान दे...

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