For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

तेरे इंतज़ार का.......

एक और साल ख़त्म हुआ तेरे इंतज़ार का...
एक और जाम ख़त्म हुआ हिज़रे -ऐ-यार का
कई रिंद मर गए पीते-पीते,
साकी बता दे पता अब तू मेरे यार का
गिन-गिन के प्याला तोड़ता हूँ,
मै तेरे मैखाने में हर रोज़
कभी तो ख़त्म हो ये पैमाना तेरे इंतज़ार का

तुझे तो कातिल भी नहीं कह सकता
क्यूँ जिन्दा छोड़ दिया मुझे तड़पने को
सारे ज़माने से तनहा होगया
क्यूँ इतना तुझे प्यार किया
मुझे कहीं पागल न समझ बैठे जमाना
इसलिए थाम लिया लबो पे तेरे फ़साने को
अब तो बस घड़ियाँ गिनता हूँ,जो तुने मुझे इनाम दिया
ये तो खुदा की खिदमत है
या की मेरे प्यार का असर
जैसे जैसे समय गुज़रा,तुझे और प्यार किया
मेरी मोहब्बत इबादत बन चुकी है
की पैमाना छलक कर बह रहा है कब से तेरे प्यार का..
देखे वक़्त कबतक करता है इंतज़ार
तेरे प्यार-ऐ-इकरार का
अभी खुशियाँ मनाओ उत्सव है
सालगिरह की मुबारकबाद दो मुझे
क्यूंकि एक और साल ख़त्म हुआ
तेरे इंतज़ार का....... !

Views: 519

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Biresh kumar on June 8, 2010 at 10:38pm
thanks sir for ur kind suggestion!!!!!!!

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 8, 2010 at 3:46pm
बिरेश कुमार भाई, मैं आपको इस सुंदर काव्य कृति के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ ! एक छोटा सा मशविरा है इस रचना के सन्दर्भ में "जुदाई-ऐ-यार" शब्द व्याकरण और भाषा की दृष्टि से सही नहीं है इसको "हिजर-ए-यार" कर लीजिये !
Comment by Rash Bihari Ravi on June 3, 2010 at 3:01pm
bahut badhia
Comment by Kanchan Pandey on June 1, 2010 at 2:14pm
Biresh jee , aapki rachnao mey dhirey dhirey bahut sudhar aa raha hai, bas likhtey rahiyey, yey post bhi badhiya hai,
Comment by satish mapatpuri on May 31, 2010 at 2:21pm
ये तो खुदा की खिदमत है
या की मेरे प्यार का असर
जैसे जैसे समय गुज़रा,तुझे और प्यार किया
मेरी मोहब्बत इबादत बन चुकी है
बहुत खूब बिरेश भाई, धन्यवाद.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 30, 2010 at 1:37pm
तुझे तो कातिल भी नहीं कह सकता
क्यूँ जिन्दा छोड़ दिया मुझे तड़पने को
सारे ज़माने से तनहा होगया
क्यूँ इतना तुझे प्यार किया
waah biresh bhai waah......ekdam se lajawab hai aapki ye rachna....aapke lekhan me din ba din uchal aa raha hai aur aap har agli rachna me pehle se behtar likh rahe hain....bahut badhiya hai...aisehi likhte rahe....

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 30, 2010 at 10:58am
जैसे जैसे समय गुज़रा,तुझे और प्यार किया
मेरी मोहब्बत इबादत बन चुकी है,
wah iresh bhai, achhi rachna hai, bahut sudhar huwaa hai aap key lekhan mey, badhiya hai, aagey bhi raheyga intjaar aapki kavitao ka,
Comment by Admin on May 30, 2010 at 9:36am
अभी खुशियाँ मनाओ उत्सव है
सालगिरह की मुबारकबाद दो मुझे
क्यूंकि एक और साल ख़त्म हुआ
तेरे इंतज़ार का.......

बहुत बढ़िया रचना है, बिरेश जी, दो बिपरीत पलो को आप ने बडे ही खूबसूरती से एक साथ समेटा है, एक तरफ तो जुदाई का ग़म भी है, पर दुसरे तरफ इन्तजार के एक साल होने पर मुबारकबाद देने की भी बात करते है, बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
5 hours ago
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
10 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service