For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गीत (पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ)

गीत (पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ)

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो,

जैसे पूछ रही हो मुझसे, क्या मुझ पर भी कुछ लिखते हो।

 

तुम नयनों से अपने जैसे

कोई सुधा सी बरसाती हो,

कैसे कह दूँ संग में अपने

नेह निमंत्रण भी लाती हो,

फिर भी कहती हो तुम मुझसे, क्यों मुझ में ही गुम दिखते हो,

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो।

 

वाणी तुम्हारी वेद मंत्र सी

पावन दिल को छूने वाली,

और रसीले अधर तुम्हारे,

केश हैं जैसे बदरा काली,

तुम मीरा सी श्याम की धुन में, जैसे हो गुमसुम दिखते हो,

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो।

 

तुम हो शरद सी ऋतु मस्तानी

हिम का घूँघट ओढ़ चली हो,

तुम वसंत में तन पर अपने

सुमन लताएँ मोड़ चली हो,

तुम वर्षा की रिमझिम धारा, और कभी फागुन दिखते हो,

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो।

----------------------------------------------------- सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 893

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sushil.Joshi on October 21, 2013 at 8:59am

गीत पर विस्तार से अनुमोदन के लिए बहुत बहुत आभार आपका आदरणीया डॉ. प्राची जी... शिल्प के विषय में आपने जो भी कुछ बताया है उस पर अवश्य ही ध्यान दूँगा..... यह मेरा सौभाग्य है जो इस मंच पर आप जैसे विद्वजनों से कुछ सीखने को मिल रहा है...... आशा करता हूँ कि यह स्नेह भविष्य में भी यूँ ही बना रहेगा..... सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 18, 2013 at 11:55pm

आदरणीय सुशील जोशी जी 

गीत की सहजता मुग्धकारी है...शब्द चयन भाव प्रस्तुति के अनुरूप सहज है ..बहुत बहुत बधाई! निश्चित ही आपके लेखन में बहुत आगे तक संभावनाएं दिखाई देती हैं.. पूरी प्रस्तुति में यदि अंतरे में ३२ और बन्दों १६-१६ मात्रा का ही निर्वहन होता प्रवाह बिलकुल निर्बाध होता...

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो,...३२ 

जैसे पूछ रही हो मुझसे, क्या मुझ पर भी कुछ लिखते हो।...३२....यदि ऊपर की पंक्ति में स्त्री के लिए दीखते हो प्रयुक्त किया गया है तो दूसरी पंक्ति में रही हो क्यों? यहाँ भी यदि रहे हो होता तो?

 

तुम नयनों से अपने जैसे...१६ 

कोई सुधा सी बरसाती हो,.१७ .प्रेम/नेह.मधुर  सुधा सी बरसाती हो..१६ (भाव वही रखते हुए शब्द को परिवर्तित कर साधना चाहिए) 

कैसे कह दूँ संग में अपने...१७ ..यहाँ संग शब्द बदले जाने से मात्रा सही होगी (..कैसे कह दूँ दृग कोरों में..१६ )शायद भाव वैसे ही लगें!

नेह निमंत्रण भी लाती हो,...१६ 

फिर भी कहती हो तुम मुझसे, क्यों मुझ में ही गुम दिखते हो,..३२ 

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो।......३२ 

 

वाणी तुम्हारी वेद मंत्र सी..१७.........तुम्हारी को बदलना चाहिए ..(वाणी शुचिकर वेद मन्त्र सी.....१६  )

पावन दिल को छूने वाली,...१६ 

और रसीले अधर तुम्हारे,....१७...... अब आप इसी प्रकार मात्रिकता पर इस गीत को साधिये और देखिये..

केश हैं जैसे बदरा काली,....१७ .................बदरा या बदरी काली 

तुम मीरा सी श्याम की धुन में, जैसे हो गुमसुम दिखते हो,...........यह पंक्ति व्याकरण के अनुरूप नहीं है..दुबारा देखिये 

पृष्ठ ह्रदय के जब मैं खोलूँ, केवल तुम ही तुम दिखते हो।

यह बहुत मधुर लालित्य पूर्ण गीत है... इस गीत प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई 

शुभेच्छाएं 

Comment by Sushil.Joshi on October 16, 2013 at 8:43pm

गीत पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय विजय मिश्र जी.....

Comment by Sushil.Joshi on October 16, 2013 at 8:42pm

आपकी यह टिप्पणी पाकर लगता है कि मेरा लेखन सफल हुआ आदरणीया शशी जी...... यह मेरी खुशकिस्मती है कि आप बार बार इस गीत को पढ़ रही हैं..... इससे अवश्य ही मुझे प्रोत्साहन मिलेगा...... सादर आभार आपका....

Comment by Sushil.Joshi on October 16, 2013 at 8:40pm

आपके स्नेह के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय अरुन जी.....

Comment by Sushil.Joshi on October 16, 2013 at 8:39pm

आपको गीत पसंद आया तो मेरी लेखनी को संबल मिला है आदरणीय बृजेश जी..... हार्दिक धन्यवाद आपका

Comment by Sushil.Joshi on October 16, 2013 at 8:37pm

अनुमोदन के लिए आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय निकोरे जी..... आप बड़ों का आशीर्वाद एवं माँ शारदे की कृपा रही तो अवश्य इस प्रकार की रचना आगे भी पढ़ने को मिलेंगी..... यद्दपि मैं इस क्षेत्र में अभी बहुत ही छोटा सा हस्ताक्षर हूँ.....

Comment by विजय मिश्र on October 16, 2013 at 6:14pm
प्रसंशनीय प्रणयगीत , प्रवाह भी मन्त्रमुग्ध करने वाला . बधाई सुशीलजी
Comment by shashi purwar on October 16, 2013 at 5:07pm

waah waah kya baat hai aapka yah geet bahut pasand aaya , har baar aati hoon to padh leti hoon , badhai aapko sushil ji

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 16, 2013 at 3:53pm

वाह आदरणीय सुशील भाई जी वाह प्रेम रंग में सराबोर बहुत ही सुन्दर गीत रचा है आपने श्रृंगार रस का धारा बह चली बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, प्रस्तुति हेतु हार्दिक धन्यवाद।  छंद की पंक्तियों में अंतर्गेयता को भी…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभा जी, आपकी रचनाओं में चित्रानुरूप संवेदना उभर कर शाब्दिक हुई है। इस तरह का वर्तमान वह…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!  आदरणीय मिथिलेश जी, आपने एकांगी, नीरस किंतु अपरिहार्यवत वर्तमान को…"
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय दयारामजी, आपकी प्रस्तुतियों का स्वागत है।  बोला छंद पर चित्रानुरूप तीनों भाव रोचक हैं।…"
3 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
" नमन, सु श्री प्रतिभा पाण्डे जी, सुन्दर रोला छंद रचे आपने, बधाई ! किन्तु , बिचारा शब्द ,…"
3 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात, भाई श्री दया राम मेठानी जी रोला छंद पर अच्छा प्रयास है, आपका । "रानी अपनी गई रूठ,…"
3 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"नमस्कार, भाई श्री मिथिलेश वामनकर जी, बहुत सुन्दर रोला छंद आधारित गीत की सृजना हुई है। बधाई स्वीकार…"
4 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"रोला छंदः भूल गया माँ बाप, बना वह.... वैरागी है । शहर बसी सन्तान,पुत्र कब अनुरागी है ।। हुई जब…"
4 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"रोला छंद  ______ पुत्र न पूछे हाल, करे क्या बाप बिचारा। स्वयं करो सब काम,नहीं दूजा है…"
4 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"चली गई तुम छोड़,  सालती रह रह बिछड़न। तुम हो मेरे साथ,  पास जब चौका बासन। सूरज जाए…"
10 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"चित्रानुकूल रोला छंद में रचना(1)अपने कांधे बोझ, सदा लेकर चलता हूँ,रोटी अपनी नित्य, स्वयं बेला करता…"
14 hours ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 155 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागत है"
yesterday

© 2024   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service