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चले आओ जहां हो तुम

दर्द रह-रह के बढ़ता है
और दिल डूबा जाता है
नब्ज़ थम-थम के चलती है
दिल ज़ोरों से धड़कता है
बीमारी बढती जाती है
फ़िक्र है खाए जाती है
सलाहें खूब मिलती हैं
दवाएं बदलती जाती हैं
दुआएं काम नही आतीं

करें क्या ऐसे में हमदम
कहाँ से चारागर पायें
मत्था किस दर पर टेंकें
कहाँ से तावीजें लायें

तुम्हे मालुम है फिर भी
छुपा कर रक्खे हो नुस्खे
न लो अब और इम्तेहाँ
चले आओ जहां हो तुम
तुम्हारे आते ही हमदम
बिमारी भाग जायेगी........

(maulik aprakashit)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 7, 2013 at 10:55am

दर्द रह-रह के बढ़ता है 
और दिल डूबा जाता है

तुम्हारे आते ही हमदम 
बिमारी भाग जायेगी....... दर्दे दिल की दास्ताँ पर सुन्दर विचार मंथन हुआ है ! बधाई एवं शुभकामनाए अनवर साहब 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 6, 2013 at 10:13pm

मनोभावों की यथा प्रस्तुति...

शुभकामनाएं 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 6, 2013 at 8:39pm

वाह वाह क्या बात है ...............एकदम सहज प्रस्तुति है बधाई हो

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 6, 2013 at 5:00pm

बहुत ही बढ़िया भाई जी थोडा और उतार चढाव होता तो आनंद आ जाता खैर इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 6, 2013 at 3:28pm

भाव बहुत सुन्दर है ! थोडा सा शब्दों का चयन अगर और कसके किया होता तो गजब ढा देते ! बधाई आपको 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2013 at 9:41am

थोड़ी सपाट बयानी हो गई है आदरणीय, इस अभिव्यक्ति पर बधाई । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 6, 2013 at 9:11am

बहुत सुंदर, बधाई आदरणीय अनवर साहब

Comment by रविकर on October 6, 2013 at 8:45am

छुपा कर रक्खे हो नुस्खे --

खुबसूरत -
आभार आदरणीय-


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2013 at 7:51am

अनवर भाई !! बहुत सुन्दर !!! बधाई !!

Comment by Sushil.Joshi on October 6, 2013 at 2:48am

हा...हा...हा.... वाह वाह.... सही कहा आपने आदरणीय अनवर भाई.... अनेक बीमारियों का एक इलाज.... अपने प्रियतम से मिलना.... कई रोगों को ठीक कर देता है... हा..हा...... बधाई हो....

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