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ग़ज़ल : दिल हो गया है जब से टूटा हुआ खिलौना

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

 

दिल हो गया है जब से टूटा हुआ खिलौना

दुनिया लगे है तब से टूटा हुआ खिलौना

 

खेले न कोई इससे, फेंके न कोई इसको

यूँ ही पड़ा है कब से टूटा हुआ खिलौना

 

बेटा बड़ा हुआ तो यूँ चूमता हूँ उसको

अक्सर लगाऊँ लब से टूटा हुआ खिलौना

 

बच्चा गरीब का है रक्खेगा ये सँजोकर

देना जरा अदब से टूटा हुआ खिलौना

 

‘सज्जन’ कहे यकीनन होंगे अनाथ बच्चे

जो माँगते हैं रब से टूटा हुआ खिलौना

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 9:30pm

बहुत बहुत शुक्रिया डॉ. सूर्या बाली "सूरज" साहब

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on September 20, 2013 at 9:03pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल, बधाई ..... 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 7:45pm

बहुत बहुत धन्यवाद Ganesh   जी, तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 7:45pm

बहुत बहुत धन्यवाद गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 7:44pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ Abhinav जी, स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 7:43pm

बहुत बहुत धन्यवाद annapurna bajpai जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 7:43pm

बहुत बहुत शुक्रिया  Shijju Shakoor जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2013 at 5:01pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी ..आपकी यह ग़ज़ल मैंने कई बार पढी ..बहुत ही उम्दा ...सादर बधाई केसाथ 

Comment by Saarthi Baidyanath on September 19, 2013 at 11:48pm

:
बच्चा गरीब का है रक्खेगा ये सँजोकर

देना जरा अदब से टूटा हुआ खिलौना.....भावपूर्ण ...अहा !..नमन सहित :)

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 19, 2013 at 10:45pm

गज़ब वाह आदरणीय जबरदस्त जवाब नहीं बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल दिल खुश हो गया पढ़कर कई बार पढ़ गया यकीन मानिये आनंद कम नहीं हुआ काफिया बहुत ही आकर्षक है आदरणीय दिली दाद कुबूल फरमाएं.

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