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ग़ज़ल : रखना ख्याल

रखना ख़याल शह्र का मौसम बदल न जाय
जुल्मत कहीं चराग़ की लौ को निगल न जाय

आमादा तो है नस्लकुशी पर अमीरे शह्र
डरता भी है कि उसका पसीना उबल न जाय

अजदाद से मिला जो असासा बचाके रख
मुट्ठी में सुखी रेत की तरह फ़िसल न जाय

तस्वीर तेरी देखकर कुछ ग़मज़दा हूँ मैं
इक दिन तेरे शबाब का सूरज ये ढल न जाय

हरगिज न आप जाइये साहिल के आस पास
डर है शवाए हुस्न से दरिया उबल न जाय

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil Thakur on September 6, 2013 at 11:25am

जिंदाबाद !जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद !

once again  जिंदाबाद ! sab jee

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 6, 2013 at 6:13am

जिंदाबाद !जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! जिंदाबाद !

Comment by Sushil Thakur on September 2, 2013 at 6:46pm

 आ.Saurabh sab, Rajesh Kumari Mam, Vinas Sab, Ashutosh Sab  बहुत बहुत शुक्रिया।  

Comment by Abhinav Arun on September 2, 2013 at 7:18am

बेहतरीन ग़ज़ल हुई है आ. सुशील जी हर शेर बोल रहा है जिंदाबाद ! इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें !

Comment by वीनस केसरी on September 2, 2013 at 3:57am

वाह ... वागर्थ में प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें
आपने यदि तर्ह २१ के वज्न में बाँधा है तो एक बार नज़ारे सानी फरमा लें मिसरा बेबहर हो जा रहा है ...

Comment by Sushil Thakur on September 1, 2013 at 6:05pm

Dharmendra sab, Arun Sab, Vandana Mam, Vinas Sab.Vijayshree Mam, Ashutosh Sab, Jitendra Sab, shyam sab, annapurna Mam, Giriraj Sab n all respected

आ. हौसला अफज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।  ग़ज़ल की सराहना जिस अंदाज़ में आप सब ने की है, मेरे पास शुक्रिया के लब्ज़ नहीं।  वीनस साब , तरह को मैंने तर-ह के जैसे कहा है।  एक सूचना आप से  आदान प्रदान करते हर्ष हो रहा है , आप सब की शुभकामनाओं की बदौलत 'वागर्थ' के इस अंक में मेरी दो ग़ज़लें आईं हैं। सादर

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 1, 2013 at 12:58pm

अच्छे अश’आर हुये हैं सुशील जी, बधाई स्वीकारें

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on September 1, 2013 at 12:28pm

वाह वाह लाजवाब लाजवाब लाजवाब दिल को छू लेने वाले अशआर वाह वाह बधाई स्वीकारें.

Comment by vandana on September 1, 2013 at 6:36am

बहुत शानदार ग़ज़ल है बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by वीनस केसरी on September 1, 2013 at 2:09am

वाह वा जनाब
एक बार फिर से आपकी शानदार ग़ज़ल ने लाजवाब कर दिया

इसके बाद तो बाद यही दोहराते बनता है ... जिंदाबाद जिंदाबाद

एक लफ़्ज़ पर मुझे आपसे इस्लाह की दरकार है ...
मैंने "तरह" लफ़्ज़ को "हरा" के वज्न में भी देखा है और और "राह" के वज्न में भी और सभी इन् दोनों को जाइज मानते हैं मगर आपने "हारा" के वज्न में बांधा है क्या यह अरूज के हवाले से जाइज है ?

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