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ग़ज़ल : न गाँधी से न मोदी से न खाकी से न खादी से

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

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न गाँधी से न मोदी से न खाकी से न खादी से

वतन की भूख मिटती है तो होरी की किसानी से

 

ये फल दागी हैं मैं बोला तो फलवाले का उत्तर था

मियाँ इस देश में सरकार तक चलती है दागी से

 

ख़ुदा के नाम पर जो जान देगा स्वर्ग जायेगा

ये सुनकर मार दो जल्दी कहा सबने शिकारी से

 

ये रेखा है गरीबी की जहाजों से नहीं दिखती

जमीं पर देख लोगे पूछकर अंधे भिखारी से

 

चुने जिसको, सहे उसके सितम चुपचाप ये ‘सज्जन’

जमाने तंग आया मैं तेरी आशिक मिजाजी से

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:24pm

आदरणीय Saurabh जी आप जो भी कहते हैं नाप तौल कर कहते हैं। असहमत होने का मौका ही नहीं देते। स्नेह बनाये रखें।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 25, 2013 at 9:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया बागी जी, स्नेह बनाये रखें।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 25, 2013 at 12:40am

इस प्रस्तुति पर कुछ कहने के पूर्व एक बात अवश्य कहना चाहूँगा कि बहुत लोगों के सीखने का अंदाज़ तक लट्ठमार होता है. हाँ, इस दौरान कुछ अच्छी बातें भी होती रहती हैं और शिष्ट संतुलन बना रहता है.

शुभम्.. .

 

आदरणीय धर्मेन्द्र भाईजी की ग़ज़ल कई बार शाब्दिक हुई दिखती है. मुँह खोल कर बोलती है. आजकल संभवतः यही दौर है.

ग़ज़लों को इनकी आँखों से बोलने दें, आदरणीय. यही हम सब समवेत प्रयास करें. ग़ज़ल शिल्प के पगहे में आ चुकी है अब इसे भाषा-व्यवहार सिखाया जाये.  है न ?

सादर

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 21, 2013 at 10:19pm

बहुत बहुत धन्यवाद  Shijju S. जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 21, 2013 at 5:30pm

आदरणीय धर्मेंद्र जी बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने वाह दाद कुबूल करें

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 21, 2013 at 12:39pm

बहुत बहुत आभार, आदरणीय गणेश भईया ! बस आप सबके साथ से सीखे के कोशिश क रहल बानी ! स्नेह हरदम रहो !

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 21, 2013 at 12:37pm

सुझाव के समर्थन हेतु बहुत बहुत आभार, वीनस भाई जी !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2013 at 8:58am

धर्मेन्द्र भाई, शानदार ग़ज़ल कही है, सभी शेर सामयिक हैं, कहन और वजन में बढ़िया सामंजस्य बैठाया है, भाई पियूष ने बिलकुल उस्तादाना सलाह दे डाली है, "गाँधी" लिखने से ये आज के गाँधियों का ध्यान तो तनिक भी नहीं आता । बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर । 
मैं पियूष को बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा जो इस उस्तादी से बात को पकड़ा है, भाई तोहरा में बदलाव लउकत बा :-)

Comment by वीनस केसरी on August 20, 2013 at 11:51pm

पियुष द्विवेदी 'भारत' जी ने शानदार सुझाव प्रस्तुत किया है ... 

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 20, 2013 at 9:07pm

आपने मेरी बात को मान दिया, बहुत बहुत आभार !

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