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अनसुलझे प्रश्न // डॉ० प्राची

प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन 

कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण 

अटल काल पर

पदचिन्हों की थाप छोड़ता 

बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना...

अन्तः की प्राचीरों को खंडित कर

देता दस्तक.... उर-द्वार खड़ा 

मृगमारीची सम

अनजाना - जाना पहचाना... 

खामोशी से, मन ही मन

अनसुलझे प्रश्नों प्रतिप्रश्नों को 

फिर, उत्तर-उत्तर सुलझाता...

वो,

अलमस्त मदन 

अस्पृष्ट वदन 

गुनगुन गाये ऐसी सरगम 

हर सुप्त स्वप्न को दे थिरकन

क्षणभंगुर जग का हर बंधन ,

फिर भी,    क्यों ऐसे देवदूत से 

बंधन ये अन्अंत पुराना सा लगता है ?

क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है?

मौलिक एवं अप्रकाशित 

डॉ० प्राची 

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Comment by Savitri Rathore on May 8, 2014 at 11:36pm

क्षणभंगुर जग का हर बंधन ,

फिर भी,    क्यों ऐसे देवदूत से

बंधन ये अन्अंत पुराना सा लगता है ?

क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है?

सुन्दर भावाभिव्यक्ति प्राची जी,बधाई हो आपको !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 16, 2013 at 9:45pm

अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तलाशती अभिव्यक्ति पर आपका अनुमोदन उत्साहवर्धक है आदरणीय गणेश जी 

सादर धन्यवाद 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 16, 2013 at 7:16pm

//बंधन ये अन्अंत पुराना सा लगता है ?

क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है?//

दोनों प्रश्न "ढूंढ़ते रह जाओगे" सरीके हैं, कौन ढूंढ़ सका है आज तक, कुछ प्रश्न अनुतरित ही रहे तो अच्छा, बधाई इस प्रस्तुति पर . 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 15, 2013 at 2:45pm

रचना के अनुमोदन के लिए आभार आ० केवल प्रसाद जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 12, 2013 at 11:29pm

आ0 प्राची मैम जी,... खामोशी से, मन ही मन
अनसुलझे प्रश्नों प्रतिप्रश्नों को
फिर, उत्तर.उत्तर सुलझाता........ यही यथार्थ भी है। अतिसुन्दर एवं लाजवाब प्रस्तुति। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 4:28pm

रचना की चंद पंक्तियों को दिल के करीब पाने के लिए आभार आ० यतीन्द्र जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 4:28pm

रचना की भाव दशा को पसंद कर अनुमोदित करने के लिए आभार आ० कविता वर्मा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2013 at 4:27pm

रचना के सराह्नात्मक अनुमोदन के लिए आभारी हूँ आ० आमोद जी 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 11, 2013 at 10:06pm

सुंदर रचना आ0प्राची जी ... 

Comment by Kavita Verma on July 11, 2013 at 9:45pm

mano bhavo ko pradarshit karti sundar rachna ..

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