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गजल : कितनी भला कटुता लिखें

भर्त्सना के भाव भर, कितनी भला कटुता लिखें?

नर पिशाचों के लिए, हो काल वो रचना लिखें।  

 

नारियों का मान मर्दन, कर रहे जो का-पुरुष,

न्याय पृष्ठों पर उन्हें, ज़िंदा नहीं मुर्दा लिखें।

 

रौंदते मासूमियत, लक़दक़ मुखौटे ओढ़कर,

अक्स हर दीवार पर, कालिख पुता उनका लिखें।

 

पशु कहें, किन्नर कहें, या दुष्ट दानव घृष्टतम,

फर्क उनको क्या भला, जो नाम, जो ओहदा लिखें।

 

पापियों के बोझ से, फटती नहीं अब ये धरा

खोद कब्रें, कर दफन, कोरा कफन टुकड़ा लिखें।

 

हों बहिष्कृत परिजनों से, और धिक्कृत हर गली,

डूब जिसमें खुद मरें वो, शर्म का दरिया लिखें।

 

कब तलक घिसते रहेंगे, रक्त भरकर लेखनी,

हों न वर्धित वंश, उनके नाश को न्यौता लिखें।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

कल्पना रामानी

Views: 801

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Comment by विजय मिश्र on June 4, 2013 at 4:07pm
कल्पनाजी ! आपको अनन्य बधाई और चयन समिति को भी . यह रचना है ही सर्वश्रेष्ठता की सुपात्रा . मन के भावों को झंकृत करने वाली .पुनश्च की अपेक्षाएँ और शुभकामनाएँ
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on June 4, 2013 at 1:37pm

मास की सर्वश्रेष्ठ रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरेया..! सादर,

Comment by MAHIMA SHREE on June 3, 2013 at 10:44pm

हर शब्द ह्रदय की वेदना और मन में  बेबसी से उपजे आक्रोश को बयाँ कर रहा है..

आपकी भावनाओ को नमन आदरणीया ..

Comment by Yogendra Singh on June 3, 2013 at 10:18pm

वाह वाह 

बहुत खूब बहुत बहुत खूब 

Comment by Anurag Singh "rishi" on June 1, 2013 at 7:12pm

वाह हर शेर एक दुसरे से उम्दा और धारदार है और बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया गया है
बधाई हो

नारियों का मान मर्दन, कर रहे जो का-पुरुष,

न्याय पृष्ठों पर उन्हें, ज़िंदा नहीं मुर्दा लिखें।

Comment by कल्पना रामानी on May 23, 2013 at 9:15am

गीतिका जी,  स्नेह पूर्ण उत्साह वर्धित करती हुई टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

 

Comment by कल्पना रामानी on May 23, 2013 at 9:11am

सरिता जी, जवाहरलाल जी, रचना को मान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद॥

सादर

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 23, 2013 at 6:09am

पापियों के बोझ से, फटती नहीं अब ये धरा

खोद कब्रें, कर दफन, कोरा कफन टुकड़ा लिखें।

वैसे तो हर पंक्ति बेजोड़ है, टिप्पणी हम क्या लिखें!

सादर! 

Comment by Sarita Bhatia on May 17, 2013 at 7:15pm

बहुत ही सार्थक रचना कल्पना जी ,आक्रोश को दर्शाती हुई रचना 

Comment by कल्पना रामानी on May 16, 2013 at 10:01pm

विजय मिश्र जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद...सादर

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